कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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जेठ जी आए द्वारे हमारे,
झट आँचल हमने संभाला।
आँखें नीचे, पलकें झुकी,
पसीने को भी अब छुपाए।
कैसे निकलूं अब द्वारे,
बाहर लगी जेठ जी की पहरेदारी।
आँचल संभालूँ या चाय का कप,
चाय से हो गई है मोहब्बत पल-पल।
पंखे, ए.सी., कूलर सब डर गए,
अब तो पसीने की हो गई है दावेदारी।
कैसे जाऊं मंदिर प्रभु के,
बाहर द्वारे जेठ जी खड़े।
बख्श दो हे ईश्वर अब।
जेठ जी को भेज दो उनके घर।
रिमझिम-रिमझिम बारिश भेजो,
ठंडी-ठंडी हवा सुहानी।
कैसे निकलूं कहीं भी,
जेठ जी द्वारे खड़े॥