हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
***********************************
आज फिर ‘धराशाई’ हो गया विश्वास,
बदलती दुनिया में ‘किस’ पर करें हम भरोसा ?
जब अपने ही घोंप रहें ‘खंजर’ तभी तो,
आज टूटते जा रहें हैं सारे ‘रिश्ते- नाते।’
दुनिया कहाँ जा रही है आधुनिकता में,
प्यार, मोहब्बत सब ‘बेमानी’ लगता है
ऐसे में जब ‘अपने’ ही देते धोखा,
तभी तो टूटते हैं सारे रिश्ते-नाते।
आज बदलते ‘जमाने’ में ‘सोनम’ या ‘सिया’ बनना,
नकारात्मकता की परिभाषा बनती जा रही है
जन्म-जन्म के साथ निभाने के ‘झूठे’ वादे करना,
ग़लत हो रहा सब, तभी तो ‘टूटते’ जा रहें हैं सारे रिश्ते-नाते।
पसंद-नापसंद अपनी होती है, फिर ऐसा धोखा क्यों ?
कसी ‘बेगुनाह’ को मार कर क्या मिल गया ?
क्या यही युवा पीढ़ी का ‘कल्चर’ है, प्यार नहीं, यह तो विश्वासघात है,
तभी तो टूटते जा रहे सारे रिश्ते-नाते॥