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तुम चले आना प्रवाह बनकर…

ममता तिवारी ‘ममता’
जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)
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पुष्प सुख आनंद का खिलता हृदय के आँगना हो,
बन वही उल्लास ऋतु आना यहीं मृदु माह बनकर…।

शीत हो तुम धूप भी तुम उष्ण सावन पतझड़ कभी,
तुम धरा में तुम गगन में तुम मनन में जित तकी
जल नहीं छिछली तली भर प्रेम सागर हे प्रभु तुम,
छींट भी सिंचन करो एक डूब जाऊँ अथाह बनकर…।

साँस जब जमने लगी हो लेखनी थमने लगी हो,
दीप में बाती बची हो पर दीया बुझने लगा हो
जब विकल मन भाव जल की सूखने सलिला लगी हो,
तुम चले आना हृदय अविरल तरल प्रवाह बनकर…।

ओज दिखते हैं नहीं तब खोज करते लोग सारे,
खोज हो जाये प्रथम फिर ओज ही तब ओज प्यारे।
मोह माया के भँवर धँस मध्य धारा में बहूँ जब,
खींच लेना बाँह मेरी आ इधर मल्लाह बनकर…॥

परिचय–ममता तिवारी का जन्म १अक्टूबर १९६८ को हुआ है। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्थित बी.डी. महन्त उपनगर (जिला जांजगीर-चाम्पा)में निवासरत हैं। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती तिवारी एम.ए. तक शिक्षित होकर समाज में जिलाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य(कविता ,छंद,ग़ज़ल) है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। पुरस्कार की बात की जाए तो प्रांतीय समाज सम्मेलन में सम्मान,ऑनलाइन स्पर्धाओं में प्रशस्ति-पत्र आदि हासिल किए हैं। ममता तिवारी की लेखनी का उद्देश्य अपने समय का सदुपयोग और लेखन शौक को पूरा करना है।

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