पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
***********************************
मेरी असली प्रेरणा…
आज मैं उम्र के छठे दशक में हूँ। मेरे बाबू जी वर्षों पहले भगवान को प्यारे हो चुके हैं। वह ज्यादा पढे नहीं थे, परंतु शिक्षा के महत्व को समझते थे। मैं अपने माता-पिता की ज्येष्ठ संतान हूँ, इसलिए लाड़-प्यार से मेरी झोली भरी हुई है। मेरे बाबू जी कड़क स्वभाव के थे, इसलिए उनसे बहुत डरती थी। अपनी जरूरतों के लिए अपनी माँ का पल्लू पकड़ कर फरियाद करती थी।
उस कालखंड में बच्चों और पिता के बीच में आज कल की तरह लाड़-प्यार नहीं होता था, वरन् छोटी -सी दूरी हुआ करती थी। हम सब भाई-बहन उनकी एक ‘हूँ… से ही डर कर कोने में दुबक जाते थे। उन्हीं बाबू जी को जब अपने बच्चों के साथ बच्चा बनते देखती तो बहुत आश्चर्य होता था। मेरे बच्चों की हर जिद वह पूरी करते। मेरे कड़क बाबू जी बिल्कुल बदल कर मोम बन गए थे। जब भी बाहर से आते, बच्चों के मन की सारी चीजें याद करके लेकर आते। यह उनका अनोखा रूप था, जो पहले कभी नहीं देखा था। बाबू जी हम सभी भाई-बहनों के जीवन के आधार स्तंभ थे। वह नित्य गंगा जी स्नान के लिए जाते थे। छुट्टी वाले दिन हम सब बच्चों को अपने साथ लेकर जाते और हम सब बोटिंग का आनंद उठाते। फिर गंगा जी के जल में देर तक नहाते और मस्ती करते।
उनका कहना था कि जीवन में झूठ और दिखावे से बच कर रहो। जितना कुछ मिला है उसके लिए भगवान् को धन्यवाद दो, आभार मानो और उतने में ही सदा प्रसन्न रहो।
वह गरीब बच्चों की पढाई के लिए आर्थिक मदद आजीवन करते रहे।
बाबू जी को लेखकों, कवि सम्मेलन आदि में जाने का शौक था। मैं छोटी थी, तब एक बार महान् कवि नागार्जुन जी को घर पर भोजन के लिए लेकर आए… धुंधली-सी याद है। सीधे-सादे ग्रामीण परिवेश का साधारण-सा व्यक्तित्व था।
मैं बी.ए. में थी। छात्र आंदोलन के कारण प्रयाग विश्वविद्यालय अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया था। उस समय उन्होंने मुझे लेख लिखने के लिए प्रेरित किया और खुशी के वह पल मेरे जीवन का अविस्मरणीय पल था, जब दैनिक समाचार-पत्र ‘आज’ और ‘दैनिक जागरण’ में मेरा लेख प्रकाशित हुआ। अवश्यमेव वही पल मेरे लेखन जगत में प्रवेश की शुरुआत थी।
जैसे सभी पिता बेटी की शादी के लिए चिंतित होते हैं, स्वाभाविक रूप से वह भी थे। कुछ दहेज की शापित प्रथा के कारण भी भयभीत रहे होंगें। उन दिनों लड़कियों का नौकरी करना इज्जत के खिलाफ समझा जाता था। बस बाबू जी ने फरमान जारी कर दिया कि अब पढ़ाई बंद करो और घर के काम सीखो। मैं बाबू जी से तो नाराजगी जाहिर नहीं कर सकती थी, तो माँ से बोली,‘’यदि मेरी जगह आपका बेटा होता तो क्या उसकी पढ़ाई भी बाबू जी बंद करवा देते ? उनके दिल में बेटे-बेटी को लेकर भेदभाव है।”
मेरी बात बाबू जी के अंतर्मन को छू गई थी। फिर उन्होंने मुझे एम.ए. ही नहीं करवाया, वरन् पी-एच.डी. भी करने से मना नहीं किया था, लेकिन शादी तय हो जाने के बाद फिर मैंने स्वयं ही ज्वाईन नहीं किया था।
मैं ससुराल से जब लौट कर घर आई तो बड़े प्यार से पूछा था, कि “बेटा वहाँ तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं ?”
मेरे बाबू जी, आप आज भी बहुत याद आते हैं। आपकी प्रेरणा से मैं लिखने लगी और मेरी रचनाएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं।
बाबू जी, आप जहाँ भी होंगे मेरी उपलब्धियों पर अवश्य प्रसन्न होंगे। आज जो कुछ भी कर पा रही हूँ, उसके पीछे आपका आशीर्वाद और प्रेरणा है।