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‘बेकार’ कार चलाना सीखें

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया-२८….

पत्नी ने घर में ज्यादा खाना बनाया तो पति ने पूछा कि घर में खाने वाले हम ३ लोग हैं, फिर तुमने ढेर सारा खाना किसके लिए बनाया है। पत्नी ने प्यारा-सा उत्तर दिया,- मुझे बचे हुए भोजन से विविध व्यंजन बनाने की विधि सीखनी है। आजकल की नौकरानी का हाल देखिए, मालकिन ने नई नौकरानी को समझाते हुए कहा, देख मैं ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर में अंगुली का इशारा करूं तो समझ लेना कि में बुला रही हूँ। नौकरानी बोली,- मैडम मैं भी ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर मैं सर हिला दूं तो आप समझ लेना कि मैं नहीं आ सकती। 
  एक ६० साल की उम्र वाले व्यक्ति की टी-शर्ट पर एक शानदार वाक्य लिखा था- मेरी उम्र ६० साल नहीं है, मैं तो केवल १६ साल का हूँ ४४ साल के अनुभव के साथ। इसे कहते हैं नजरिया।
  परमात्मा कभी किसी का भाग्य नहीं लिखता है, बल्कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर आपके कर्म और आपकी सोच से आपका भाग्य लिखते हैं। पत्नी ने पति को किचन में स्वीट डिश बनाना सिखाई। पति ने पूछा- इसके बदले में तुमको क्या गुरु दक्षिणा दूँ ? पत्नी ने कहा- पड़ोसन को आज से तुम दीदी बोलना शुरू कर दो। घर में चाहे १० कमरे हों, पर रौनक उसी कमरे में होती है, जिसमें माँ होती है।

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 जीवन में रखो-एक मति और दूसरी श्रीमती का। मति सही होगी तो ईश्वर भजन में लगे रहोगे और श्रीमती सही रहेंगी तो आपके खाने-पीने का इंतजाम होता रहेगा।
एक ड्राइविंग स्कूल वाले ने अपने यहाँ बोर्ड लगाकर रखा था-बेकार कार चलाना सीखें।
  गांधी जी के ३ बंदर थे, अब तीनों को मिलाकर इस कलियुग में मोबाईल आ गया है। जब मनुष्य के हाथ में मोबाईल होता है, तो वो ना किसी से बोलता है, ना किसी को देखता है और ना किसी की सुनता है। समझ में नहीं आता है कि गर्मी खून में ज्यादा है या जून में। अगर खुश रहना है तो चुप रहना सीखिए, क्योंकि खुशियों को शोर पसंद नहीं है। कुछ हासिल करने के लिए जरूरी नहीं है, कि हमेशा दौड़ा जाए। बहुत-सारी चीजें ठहरने से भी प्राप्त हो जाती है, जैसे-सुख, शांति और सुकून।
  पैसा आएगा, चला जाएगा, खुशियाँ आएंगी, चली जाएंगी, एक मोटापा ही सच्चा दोस्त है, जो आकर जाता नहीं है। जीवन में भरोसा सब पर रखिए, परन्तु किसी के भरोसे मत बैठे रहिए। पूरी दुनिया का लिए आप एक इंसान हो सकते हैं, लेकिन अपनी माँ के लिए आप ही उसकी पूरी दुनिया हैं। लोग ईश्वर से शिकायत करते हैं, ईश्वर ने आपका पेट भरने की जिम्मेदारी ली है, पेटियाँ भरने की नहीं। भगवान ने पैसा भी क्या मस्त चीज बनाई है, बचपन में माँगना पड़ता है, जवानी में कमाना पड़ता है और बुढ़ापे में यहीं छोड़कर जाना पड़ता है। यदि ईश्वर का दर्शन और मित्र का मार्गदर्शन मिलता रहे, तो हमारा जीवन हमेशा खुशियों से भरा रहेगा।
  किसी की अंतिम यात्रा में जाओ तो ये मत समझना कि तुम उसे उसकी मंजिल पर ले जा रहे हो, बल्कि ये समझना कि अर्थी पर लेटा इंसान तुम्हें तुम्हारी मंजिल दिखाने ले जा रहा है। ‘मतलब’ बहुत वजनदार होता है…,’ निकल जाने के बाद हर रिश्ते को हल्का कर देता है। आजकल सबका यही हाल है खुद को क्या करना है, पता नहीं, मगर… दूसरों को क्या करना चाहिए, उसकी सलाह सबके पास है।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |