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दहेज अभिशाप, प्रेम विवाह हो आज

संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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कड़ी मेहनत और खून पसीना जलाकर माँ- बाप करें घर को आबाद,
भेद-भाव न करते मन में बेटी, बेटा हो या बेऔलाद
कौड़ी-कौड़ी जोड़-जोड़ कर, जमा-पूंजी सब तोड़-तोड़कर,
खेती-बाड़ी बेच-बेच कर, गहने गिरवी रख- रख कर
देखते सपने हज़ार, माँ-बाप हुए लाचार,
तांडव दहेज का इतना चढ़ा अब रहा न लाख हजार
लड़कों के मंडी में भाव चढ़े अब 30 लाख के पार,
बिटिया को भी खूब पढ़ाया, इंजीनियर- डॉक्टर बनवाया
शादी का वो दिन भी आया, कई जगह में रिश्ता भाया,
लड़के से लड़की को भी मिलाया, न पसंद की कुंदस काया
परिजन लौट सब बैरंग आया, देश अज़ब, ये गज़ब है हिंदुस्तान,
रिश्तों के इस मोल भाव मे माँ बाप हैं यूँ परेशान
जातिवादी सोंच मे पलकर, पुरखों के संस्कार में बंधकर,
गौ माता सी पगहा बंधती, मुँह बंद बेटी लाचार
माँ-बापू की इच्छा को बेटी कैसे करे इंकार,
बिटिया का गजब है ये व्यवहार
माँ-बापू की खुशी की खातिर सह लेती दुःख अपार,
शादी के सब लेन-देन पर हुए जब वो तैयार
इतना चाहिए रुपया पैसा, सोना-चाँदी ऐसा- वैसा,
बर्तन, फर्नीचर, ए.सी., गीजर और कार हो क्रेटा मॉडल जैसा
वैसे तो नए बंगले भी दे दो, मन में थे उनके विचार,
अजब-गजब सी लगती है मेरे देश की ये सरकार
कितने कानून दहेज प्रथा पर बन गए, फिर भी है लाचार,
अजब है ये मेरी सरकार, गज़ब है ये मेरी सरकार।

शादी होती घड़ी विदाई की आती, बिटिया रोती, रोता घर परिवार,
माँ-बापू की आँखों से गिरती तब अविरल अश्रु धार
अजीब-सी चिंता मन में, सन्नाटा घर-आँगन में, चिंतित सारा परिवार,
साज में लिपटी पहुँची बिटिया जब अपने ससुराल
सबके मन में खुशी देख कर हुई स्नेह निहाल,
स्वागत में सब परिजन जुटे, खुशी में होती बात,
बहू को देखें, बहू से मिलते दिन था वो ‘बहू- भात’
पांचवे दिन बहू दूल्हे संग बिताई सुहाग की रात,
छठे दिन ही दूल्हे ने बदले व्यवहार और बात,
सिगरेट पीता, दारू पीता, धुँआ करता बदन जलाता,
चिल्लाने पर चाँटे मारता, गला दबाता, यह कैसा अत्याचार ?
देखे थे कितने सब सपने, बिटिया ने सोंचे थे कैसे-कैसे प्यार ?

सहती रही जलन की पीड़ा, की न चीख- पुकार,
क्या मस्ती क्या क्रीड़ा करती ‘मूक बधिर’
बन तड़प-तड़प कर सहती रही विकार,
किससे ये किस्से बताए अपने ससुराल का ऐसा सब सत्कार,
मन को अंदर मन में रखकर दिनभर करती रही चीत्कार
माँ-बापू के आते ही बिटिया के दिल से फूटे गुबार,
बापू मैं अब बोल न पाऊँ, कैसे व्यक्त करूँ उदगार,
कैसी शादी है मम्मी-पापा ये जहाँ दिए सारे उपहार,
ये दहेज के हैं व्यापारी, नहीं कोई हैं धंधे चार।
सासू माई करें लडाई, पति देव परमेश्वर जैसे लेकिन बड़े कसाई,
उसने ही सिगरेट से मेरी सारी काया जलाई,
मम्मी तुम तो आज हो आई,
मेरा जीवन है मझधार, नहीं सहूँगी ऐसा अत्याचार,
मम्मी-पापा अब न रहूँगी, नहीं सहूँगी इतने घिनौने आचार-विचार,
हमें साथ ले चलो वहीं जहाँ तेरे जैसा मिले स्नेह, आशीष और प्यार,
दहेज का तांडव देख-देख कर, दिल पर रख दिया है पत्थर,
सुबह-शाम दिन-रात कराते काम सभी ये नौकर से भी बदतर,
चुगली-फुसली करते रहते सब आपस में ही मिलकर,
रुपया कम का ताना देते, कार ब्रांडेड बड़ी चाहिए,
सोना के संग हीरा मांगे मुँह अपने खोलकर,
मेरा छुट्टी-छुट्टा करवा दो, जैसे-तैसे तलाक करा दो,
मर रही यहाँ घुट घुट कर, नहीं यहाँ अपने जैसा कोई नहीं है अच्छे विचार न अच्छे कोई संस्कार,
जाति-पाती भस्म हो गई, बापू की इच्छा जलकर हुई सब राख,
माँ तू अब न करना इन दहेज लोभियों को माफ
पर्दा खोल के बिटिया बोली…
ये कैसी है शादी पापा, कैसा है इनका राज,
रोज-रोज ही हम पर गिरती है कम दहेज की गाज
माँ-बापू से मेरा अब दिल से है आग़ाज़,
दहेज दरिंदों को सजा दिलाओ, वो भी अभी और आज,
बंद इन्हें अब जेल करा दो, तभी खुलेगा राज
कब तक दबा-दबा रखूँ अपनी मैं आवाज़,
प्यारी मम्मी-भोले पापा, हमें दो जीवन चंद, न करो नज़र से बंद
निवेदन अंतिम तुमसे मेरा अब हमें करो उन्मुक्त स्वछंद,
जाति बंधन तोड़ो, सारी सोच-समझ से बनेगी बात
जाति दहेज को नंगा कर दो और करो आघात,
अब धरो न हाथ पर हाथ, करो जोर वज्रपात
बिटिया को भी स्वयं मिले स्वयंवर का अधिकार,
तभी कटेगा लोभी जालिम, जाति-दहेज की तीखी धार।
मैं दुर्गा खुद बन जाऊंगी, दूल्हों की मंडी जलाऊँगी,
ये अत्याचार मिटाऊंगी, अपनी नैया खुद ही पार लगाऊँगी,
मुझे अब यूँ न छोड़ो, ये जाति बंधन तोड़ो।

है दहेज के मूल में जाति, घमंड में जातिवाद,
देश से जातिवाद मिटाकर होगा इसका प्रतिवाद
अज़ब देश की गज़ब है दिखती अब तक की ‘थोथी’ सरकार,
कानून दहेज का खूब बनाती, लेकिन सब धिक्कार
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ये सपना हो साकार,
जब तक नहीं सोचेगी इस पर भारत की आबादी।
दहेज प्रताड़ना घर-घर होगी, बिटियों की होगी बर्बादी,
व्यर्थ है सब, मिथ्या है मेरे देश की ये आज़ादी॥

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