दिशाहीन विपक्ष

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गोपाल मोहन मिश्र
दरभंगा (बिहार)
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मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही लगभग हमेशा ही यही लगा कि विपक्ष पूरी तरह से दिशाहीन है। ऐसे कई छोटे-बड़े मुद्दे थे,जहाँ विपक्ष को अपनी ऊर्जा और समय खर्च नहीं करना था लेकिन किया गया और जहाँ खर्च करना चाहिए था वहाँ नहीं किया गया। वजह यही है कि योग्यता की जगह परिवारवाद और जातिवाद से इन दलों के शीर्ष पर पहुंचे नेताओं को कौन उचित सलाह देगा ? अयोग्य व्यक्ति जब भी उच्च स्थान पर पहुँचता है वो सबसे पहले योग्य को बाहर करता है, ताकि भविष्य में उसके स्थान के लिए कोई खतरा न हो। वही इन सभी दलों में हुआ। योग्य नेताओं को या तो सीधा बाहर कर दिया गया या फिर इतना अपमान किया गया कि परेशान होकर उन सभी योग्य व्यक्तियों ने या तो राजनीति छोड़ दी या दल बदल लिया। अब जो हैं उनमें ज्यादातर चापलूस, मौकापरस्त और अयोग्य व्यक्ति है तथा यदि कोई योग्य है भी,तो वो हताश-निराश होकर घर बैठा है, क्योंकि दल में उसकी कोई इज्जत ही नहीं है। योग्य व्यक्तियों और योग्य नेतृत्व के अभाव में ये सभी पार्टियां आने वाले समय में और भी ज्यादा कमजोर ही होंगी।
मौजूदा विपक्ष को न तो यह समझ है कि किस मुद्दे को कब उठाना है, कितना कम या ज्यादा उठाना है और किन मुद्दों पर नपी-तुली गंभीर प्रतिक्रिया देनी है एवं कहाँ चुप्पी साधकर सरकार की आलोचना करने से बचना है। वैसे तो ऐसे कई मौके आए, जब विपक्ष ने दिशाहीन होने के सबूत दिए हैं पर ऐसे ५ प्रमुख उदाहर-
◾सभी के अकाउंट में १५ लाख आने वाली बात।जनता को अच्छे से पता है कि यह कहावत या तुलनात्मक बात कही गई थी कि इतना काला धन है कि उस से सभी को १५-१५ लाख रुपए दिए जा सकते हैं। आमतौर पर बातचीत के बीच में कई बार ऐसे उदाहरण दिए जाते हैं। एक बार मैंने कहीं पढ़ा था कि बिल गेट्स के पास इतना इतना धन है कि वो धरती से चाँद तक की सड़क कई बार बनवा दे। अब कोई मूर्ख ही होगा जो इस बात पर कुछ समय बाद पूछे कि भाई उस सड़क का क्या हुआ, कब बनेगी ? इस जुमले पर मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्ष ने अनावश्यक ऊर्जा और समय खर्च किया और उसका कोई चुनावी फायदा भी नहीं हुआ।
◾पाकिस्तान की ओर से होने वाली गोलाबारी और सेना के जवानों पर होने वाले हमलों का मुद्दा भी समझिए। यदि विपक्षी पार्टियाँ चाहतीं तो इस मुद्दे पर भाजपा को घेर सकतीं थीं। भाजपा नेता अपने ही दिए कई पुराने भाषणों की वजह से परेशान हो जाते, परन्तु यहाँ ऐसा लगा कि जैसे इस मुद्दे के लिए विपक्ष के पास न तो ज्यादा ऊर्जा है और न ही समय। हद तो यह हो गई कि जितनी ऊर्जा और समय विपक्ष ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने में खर्च नहीं किया, उससे कहीं ज्यादा ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ को फर्जी बताने में किया। कोई भी बुद्धिमान नेता उस समय अपनी अधिकतम ऊर्जा और समय केंद्र सरकार को पाकिस्तान की ओर से होने वाली गोलाबारी और सेना के जवानों पर होने वाले हमलों के मुद्दों पर घेरने में खर्च करता, क्योंकि उससे वो मोदी सरकार की दिलेर और कड़े कदम लेने वाली छवि को चोट पहुंचा सकता था एवं ये नेता स्ट्राइक पर बस सेना और सरकार को धन्यवाद कहकर चुप्पी साध लेता तथा कोशिश करता कि यह मुद्दा कम से कम उठे ताकि भाजपा को इसका ज्यादा चुनावी फायदा न मिले, परन्तु भाजपा से ज्याद स्ट्राइक का मुद्दा तो विपक्ष ने उठाया और ऐसा करके खुद की छवि पाकिस्तान परस्त बना डाली और भाजपा के मत ही बढ़ाए।
◾जे. एन यू की देशद्रोही नारेबाजी भी समझिए।
जे.एन.यू. के वामपंथी छात्रों और शिक्षकों की सोच के बारे में पूरा देश जानता है। भारत विरोधी नारेबाजी के बाद यदि विपक्ष इन छात्रों के खिलाफ हुई कार्यवाही की मांग करता और बार-बार यह सवाल उठाता कि जांच एजेन्सियाँ कब जांच पूरी करेंगी व कब सरकार दोषियों को सजा दिलवाएगी तो अपना नुकसान होने से बचा लेता, परन्तु सिर्फ केंद्र सरकार का अनावश्यक विरोध करने के लिए विपक्ष ने देशद्रोह के आरोपियों का समर्थन करके एक बार फिर अपनी छवि पाकिस्तान परस्त ही बना ली। वामपंथी दलों से तो वैसे भी यहाँ यही उम्मीद थी। अगर कुछ ज्यादा न कहकर वही राजनीतिक जुमला ही छोड़ दिया जाता कि ‘हम इसकी निंदा करते हैं और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की मांग करते हैं’ तो भी विपक्ष को नुकसान नहीं, बल्कि शायद फायदा ही होता,पर यहाँ भी यही लगा कि विपक्ष को पता ही नहीं कि क्या करना है।
◾ नोटबंदी मामले में जनता शुरू से ही इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ थी। विपक्ष ने सारा समय नोटबंदी को हटाने की मांग में लगाया। हालाँकि, वजह यही थी कि नोटबंदी की वजह से कई नेताओं को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ था लेकिन इतनी समझ तो विपक्ष में होनी चाहिए थी कि जिस कदम पर केंद्र सरकार को जनता का इतना ज्यादा समर्थन मिल रहा है, उसको तो वो कभी वापस नहीं लेगी। जब पता ही है कि नोटबंदी वापस नहीं होने वाली तो अपना ध्यान उस दिशा में लगाते कि सरकार से यह पूछा जाए कि इससे कितना काला धन वापस आया, कुल कितना सरकारी धन इस कदम पर खर्च किया गया और कितना कुल फायदा सरकारी खजाने को हुआ। कितना भ्रष्टाचार रुका, कितना आतंकवाद रुका आदि ऐसे कई सवाल थे जिन पर केंद्र सरकार से पूछा जाता तो लगता कि विपक्ष सही दिशा में बहस करना चाहता है, परन्तु कभी विपक्ष ने इसे जनता को परेशान करने वाला कदम बताया तो कभी बड़ा घोटाला ही बोल दिया और कुछ नेताओं ने इसे धार्मिक रंग तक दे डाला।
◾मुस्लिम तुष्टिकरण और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दू विरोध को भी देख लीजिए। इस देश में ज्यादातर ऐसा समय रहा जबकि हिन्दुओं में एकता नहीं रही। यही वजह थी कि इतना बड़ा देश इतने लम्बे समय तक गुलाम रहा। इस मामले में आजादी के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया। भाजपा ने कई बार हिन्दुओं को एक करके एक बड़ा मत बनाने की कोशिश की, लेकिन भाजपा की अपनी ही गलतियों की वजह से ९० के दशक का अंत आते-आते हिंदुत्व के मुद्दे पर मत मिलने लगभग बंद ही हो गए थे और राजनीति में जातियाँ हावी हो गई। फिर भाजपा विरोधी दलों द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किए जा रहे हिन्दू विरोध और नरेन्द्र मोदी की कट्टर हिन्दू वाली छवि की वजह से यह हिंदुत्व का मुद्दा २०१४ के लोकसभा चुनावों में पुनः जागा और पिछली बार से कहीं ज्यादा असर व ताकत के साथ वापस आया। उत्तर प्रदेश ने लोकसभा और फिर विधानसभा में भाजपा को ये बड़ी जीत विकास से ज्यादा हिंदुत्व के नाम पर दी थी। सेक्युलर पार्टियाँ पहले भी सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण ही करती थीं, परन्तु हिन्दू विरोध एक सीमा से ज्यादा नहीं किया जाता था। उनको उसका फायदा यह होता था कि मुसलमान मत इनको एक होकर मिल जाता था और हिन्दू मत वो जातियों में तोड़कर ले लेते थे, परन्तु अब इनके हिन्दू विरोध ने सारी सीमाएं ही पार कर दीं हैं। हर बात में हिन्दुओं का विरोध, वो भी ऐसे देश में जहाँ आज भी हिन्दू बहुसंख्यक है। इसे बस मूर्खता ही कहूंगा। इसका फायदा भाजपा को यह मिला कि वो हिन्दुओं के एक बड़े प्रतिशत को एक करने में सफल रही और साथ ही श्री मोदी की वजह से इसने अपनी सवर्णों की पार्टी वाली छवि भी बदल ली।
योग्य नेतृत्व और कार्यकर्ता के अभाव में आने वाले समय में विपक्षी दलों की और भी ज्यादा दुर्दशा ही होनी है। भाजपा को भी विपक्ष की इस दुर्दशा से सीख लेनी चाहिए, क्योंकि कई मौकों पर अब भाजपा में भी मौकापरस्तों और जातिय समीकरण के आधार पर नेता बने अयोग्य लोगों को योग्य से ज्यादा सम्मान और पद दिए जा रहे हैं। दूसरी पार्टियों से आए कई मौकापरस्तों को आते ही बड़े पद और चुनावी टिकट दे दिया जाता है, मंत्री बना दिया जाता है। विपक्षी दलों की दुर्दशा से सीखने की जगह भाजपा भी धीरे-धीरे उनकी बुराइयों को अपनाती जा रही है। इन बुराइयों से शुरुआत में तो वैसे ही अच्छे चुनावी परिणाम आते हैं, जैसे इन विपक्षी दलों को आते थे, परन्तु धीरे-धीरे पार्टी अपने विनाश की ओर बढ़ती है। यदि भाजपा नहीं सुधरी तो आने वाले कुछ साल बाद ऐसे ही कुछ हश्र भाजपा का भी हो सकता है।

परिचय–गोपाल मोहन मिश्र की जन्म तारीख २८ जुलाई १९५५ व जन्म स्थान मुजफ्फरपुर (बिहार)है। वर्तमान में आप लहेरिया सराय (दरभंगा,बिहार)में निवासरत हैं,जबकि स्थाई पता-ग्राम सोती सलेमपुर(जिला समस्तीपुर-बिहार)है। हिंदी,मैथिली तथा अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले बिहारवासी श्री मिश्र की पूर्ण शिक्षा स्नातकोत्तर है। कार्यक्षेत्र में सेवानिवृत्त(बैंक प्रबंधक)हैं। आपकी लेखन विधा-कहानी, लघुकथा,लेख एवं कविता है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। ब्लॉग पर भी भावनाएँ व्यक्त करने वाले श्री मिश्र की लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक- फणीश्वरनाथ ‘रेणु’,रामधारी सिंह ‘दिनकर’, गोपाल दास ‘नीरज’, हरिवंश राय बच्चन एवं प्रेरणापुंज-फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शानदार नेतृत्व में बहुमुखी विकास और दुनियाभर में पहचान बना रहा है I हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान की प्रबल धारा बह रही हैI”