रचना पर कुल आगंतुक :88

You are currently viewing दुर्दशा देख दिल रो दिया…

दुर्दशा देख दिल रो दिया…

राधा गोयल
नई दिल्ली
******************************************

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (व द्वारिका-जहाँ भगवान कृष्ण और सुदामा की भेंट हुई थी) मंदिर के अंदर दुकानें सजी हुई थीं। पूजा की सामग्री बेची जा रही थी जिसके अलग-अलग दाम थे। अंदर बैठकर पूजा करने वालों के लिए हजार रूपए का पैकेट, जिसने बाहर से ही पूजा सामग्री चढ़वानी थी, उसका अलग।
रैलिंग लगी हुई थी जहाँ मन्दिर द्वारा तैनात एक व्यक्ति मंदिर के अंदर गर्भ गृह में झाँकने तक नहीं दे रहा था। रट लगा रखी थी ‘बढ़ो-बढ़ो, आगे बढ़ो।
बढ़ो-बढ़ो, आगे बढ़ो। बढ़ो, आगे बढ़ो।’
मेरे जैसी भी कहाँ कम थी। मैंने भी उसकी आँखों में देखकर बोलना शुरु किया-‘बढ़ो, बिल्कुल कुछ मत देखो। बढ़ो-बढ़ो, कुछ मत देखो। आगे बढ़ो आगे बढ़ो। कुछ मत देखो। कुछ मत देखो। यहाँ आकर भी कुछ मत देखो।’ उसने मुझे घूरकर देखा और चुप हो गया। एक चबूतरे पर मोटे-मोटे पंडे बैठे हुए थे। मंदिर के बाहर गायों की दुर्दशा देखकर हैरान थी कि द्वारकाधीश की नगरी में ज्योतिर्लिंग के बाहर गायों की इस प्रकार की दुर्दशा..?? गायों की आँखों से अश्रु बह रहे थे। गाएं यहाँ-वहाँ लावारिस घूम रही थीं। शुक्र है कि एक जगह एक स्त्री अपने रेहड़ी पर घास के पूले बेच रही थी और शायद गाएँ भी उसी की थीं, जो वहाँ एक तरफ घूम रही थीं। उससे कई लोगों ने २०-२० ₹ के चारे के पूले खरीदे और गायों के आगे डाले। किसी को इसमें कोई एतराज नहीं लगा बल्कि पुण्य कर्म समझकर यह काम किया। कम से कम वह स्त्री भीख तो नहीं माँग रही थी, भले ही गाएँ उसकी अपनी हों या किसी अन्य की। गायों को चारा खाने को मिल रहा था और उस स्त्री को रोजगार का साधन। क्या मन्दिर के पण्डे ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकते! सही मायने में तो उनको गौशाला बनानी चाहिए, अथवा कुछ लोगों को इसी काम पर लगा देना चाहिए कि वह चारे की रेहडी लगाएँ। गायों के प्रति श्रद्धा रखने वाले लोग अपने-आप ही खरीदेंगे और गायों को खिलाएँगे। केवल यह देखकर खुशी हुई कि ज्योतिर्लिंग का मंदिर बेहद भव्य बना हुआ है। उसके प्राचीन स्वरूप को भी कायम रखते हुए अभी भी निर्माण कार्य हो रहा है। यात्रियों के ठहरने के लिए निवास स्थल भी है। मेरी इच्छा थी कि वहाँ से सम्बंधित कुछ जानकारी जुटा पाऊँ, किन्तु निराशा हाथ लगी।
एक अन्य मंदिर (भेंट द्वारिका) देखा, जो काफी जर्जर अवस्था में था। वहाँ नाव द्वारा ही जाया जा सकता है क्योंकि वह समुद्र के बीच में है। बाकी सारी द्वारिकापुरी तो महाभारत युद्ध के ३६ वर्ष बाद ही समुद्र में समा गई थी, केवल भेंट द्वारिका बची है। यहाँ श्रीकृष्ण और सुदामा की भेंट हुई थी और श्रीकृष्ण ने सुदामा के तंदुल (चावल) खाए थे।
नाव से उतरने पर काफी लम्बा पुल पार करने के बाद संकरी गलियों के अंदर मंदिर था। गलियों में पूजा सामग्री की ढ़ेरों दुकानें थीं। पता लगा कि वहाँ मुस्लिम ज्यादा और ब्राह्मण कम रहते हैं। हर पंडित वहाँ सिर्फ माँगने में लगा हुआ था। मैंने कम से कम १० पंडितों से ट्रस्ट का नंबर माँगा। उन्हें कहा कि यहाँ मंदिर के बाहर गाय किस प्रकार से रो रही हैं।
वाकई गायों की आँखों से आँसू बह रहे थे।
एक पंडित ने दूसरे के पास…दूसरे ने तीसरे के पास…तीसरे ने चौथे के पास…कम से कम १० पंडितों के पास भेजा। दसवें के पास जाकर मुझे गुस्सा आ गया। मैंने कहा-‘पंडित जी! भगवान कृष्ण की नगरी में गायों की ऐसी दुर्दशा!!!! देखकर दिल रो रहा है। गायों के साथ इतना अत्याचार क्यों हो रहा है ? मुझे ९ पंडितों ने आपके पास भेजा है कि आपके पास ट्रस्ट का नंबर है। गोपालक, गोवल्लभ, गौपूजक कृष्ण की नगरी में गायों की इतनी दुर्दशा है कि देखकर बड़ा दु:ख हो रहा है। क्या आप मुझे यहाँ के ट्रस्ट का नंबर देंगे ?’
‘मेरे पास नंबर नहीं है।’
‘लेकिन मुझे तो यही कहा गया है कि आप मुख्य पुजारी हैं।’
‘नहीं, आप गेट से बाहर निकलेगें तो दाईं तरफ ऑफिस है।’
‘पक्का, वहाँ ऑफिस है ?’
‘पता नहीं, आप गेट के बाहर निकलकर पूछ लेना।’ ‘सभी यही कह रहे हैं। इधर जाओ, उधर जाओ। आपने भी यही कह दिया कि पता नहीं, बाहर जाकर पूछ लेना। फिर आप किस बात के पंडित हो ?’
‘हाँ हाँ!! नहीं हूँ मैं पंडित। मैं गुण्डा हूँ। यहाँ अपने खाने के लिए नहीं है, गायों के लिए कहाँ से लाएँ ?’
‘आपको मैंने यह तो नहीं कहा कि आप व्यवस्था करो। आपसे केवल नंबर माँगा है जिससे कि जहाँ-जहाँ बड़ी-बड़ी गौशाला बनी हुई हैं और वहाँ के ट्रस्टी हैं, हम उनसे संपर्क साध सकें और कह सकें कि भेंट द्वारिका के मंदिर के बाहर भी गायों की कुछ व्यवस्था करवाओ, अथवा उन गायों को अपनी गौशाला में मँगवाओ। यदि वह ऐसा नहीं करते हैं तो हम वहाँ किसलिए दान करेंगे।’
उस पर कोई असर होता दिखाई नहीं दिया। मैंने मन में सोचा कि यदि यही पंडित अपना दंभ छोड़ कर रेहड़ी पर गायों का चारा रखकर घूमे तो क्या लोग स्वयं ही खरीद कर गायों के आगे नहीं डालेंगे ? बेहिसाब लोग मंदिर दर्शन के लिए आए हुए थे। १ हजार दर्शनार्थियों में से १०० लोग तो जरूर खरीदेंगे और गायों को भूखा मरने की नौबत नहीं आएगी, लेकिन दंभ कौन छोड़े।
वहाँ एक गुड़ बनाने की फैक्ट्री है। बेहिसाब गन्ने के छिलके पड़े थे। कितनी ही गायों का पेट भर सकता था। फैक्ट्री वालों ने तो बाद में उस ढ़ेर को आग के हवाले ही करना था, लेकिन अपने आपको पंडित कहने वालों को इन सब पचड़ों में पड़ने की क्या जरूरत, जब दान दक्षिणा से पेट भर जाता हो।उनकी बला से कि गौ प्रेमी कृष्ण की नगरी में गायों के साथ कैसा अमानवीय अत्याचार हो रहा है ???
उस मंदिर में दीवारों पर इतनी धूल जमी हुई थी जिसका कोई हिसाब नहीं है। कृष्ण के बालपन की काफी मूर्तियाँ बनी हुई थीं। धूल साफ करने में तो कोई पैसे नहीं लगते। उसमें भी उनका दंभ आड़े आता है। मंदिरों की ऐसी दुर्दशा देखकर दिल बहुत रोता है। मंदिर के बाहर भीख माँगते लोग दिखाई देते हैं और हम अंदर मनोकामना करने जाते हैं।

Leave a Reply