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देशप्रेम की ज्वाल अलौकिक

राधा गोयल
नई दिल्ली
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अशोक चक्र से सम्मानित कै. उम्मेद सिंह महर…

भारतीय जवानों के शौर्य के कुछ किस्से बतलाएँ,
अशोक चक्र से सम्मानित वीरों की गाथा आज सुनाएँ।

आज सुनाएँ कैप्टन उम्मेद सिंह महर की शौर्य गाथा,
चौड़ा किया था जिसने मातु भारती का माथा।

देशभक्ति से भरा हुआ दिल वाला था वो शेर,
हुआ गोलियों से छलनी, पर दुश्मन को कर दिया ढेर।

देशप्रेम की ज्वाल अलौकिक, दिल में भरी हुई थी,
आँच ना आने दूँगा माँ पर, दिल में ललक भरी थी।

माँ और मातृभूमि तो होती स्वर्ग से अधिक महान,
आवश्यकता पड़ने पर जीवन कर देते कुर्बान।

मातृभूमि का कर्ज़ वीर इस तरह चुकाते हैं,
आँख दिखाने वालों को वे धूल चटाते हैं।

बीहड़ जंगल में जाने पर तनिक नहीं घबराते,
राहों के काँटे भी उनके लिए फूल बन जाते।

कदम-कदम पर जहाँ जिन्दगी इम्तिहान लेती है,
इनके साहस के आगे, वह हार मान लेती है।

हाड़ गला देने वाली सर्दी में वीर न विचलित होते,
आग उगलते सूरज में भी आगे बढ़ते रहते।

नापाक मंसूबों वालों ने जब-जब भी नजर उठाई,
वीर सपूतों ने तब-तब ही उनको धूल चटाई।

यही है वीरों की पहचान, बढ़ाते हैं जो देश का मान,
हथेली पर लेकर चलते, सदा ही वे तो अपनी जान।

दिलों में हौंसला और विश्वास, देश पर आने न दी आँच,
बड़ी से बड़ी विपत्ति में, रखी है अपने देश की लाज।

बेशक अलग-अलग भाषा और रहन-सहन के ढंग,
धर्म हमारा सिखलाता कि लहू का एक ही रंग।

एक हमारा गुलशन है और एक हमारा माली,
अलग रंग के फूलों से ही गुलशन में हरियाली।

जगतनियंता तो हमको सुंदर संसार में लाया था,
अलग-अलग फूलों से उसने यह संसार रचाया था।

अति विस्तारवाद ने विश्व में तांडव खूब मचाया था,
सौहार्द प्रेम भाईचारा कुछ लोगों को नहीं भाया था।

वीर जवानों ने ऐसों को हरदम धूल चटाई,
चीर दिया दुश्मन का सीना, मातृभूमि मुस्काई।

ऐसी ही मुस्कान खिली थी अल्मोड़ा के गाँव में,
प्राकृतिक सौंदर्य की विरासत, रहती जिसकी छाँव में।

इसी जिले के एक गाँव में, खुशियों की गूँजी शहनाई,
इक्कीस जनवरी बयालीस में वीररत्न पाकर मुस्काई।

नाम गाँव का चम्पावत था और जिला अल्मोड़ा,
जन्मा था एक वीर, किया माता का भाल चौड़ा।

नाम रखा उम्मेद सिंह, जो उम्मीदों से भरपूर था,
देश को उस पर नाज है, परिवार को उस पर गुरूर था।

ऐसा वीर पुत्र पाया भारत का ऊँचा भाल किया,
जिसकी शौर्य गाथा सुन-सुन कर, सारा देश निहाल हुआ।

ग्यारह जून सड़सठ में सैन्य अकादमी से स्नातक की उपाधि पाई,
ग्यारह जून रजपूताना राइफल्स में पदोन्नति पाई।

चार से छह जुलाई तक ऑपरेशन आर्केड चला,
नागालैंड के उग्रवादियों से कड़ा संघर्ष चला।

देशभक्ति से भरा हुआ दिल वाला था वो शेर।
अपनी योजना से जिसने दुश्मन को कर दिया ढेर।

उस जांबाज ने दुश्मन की सेना को मार गिराया,
देशभक्ति का प्रतिनिधि बन, भारत का मान बढ़ाया।

आतंकवादी अनगिनत और इनके सैनिक थे साठ,
बीस-बीस के तीन दलों में उन्हें दिया था बाँट।

आँखों में शोले सीनों में ज्वालामुखी लिए,
निकल पड़े वीर मातृभूमि की रक्षा के लिए।

नापाक मंसूबों से जिसने, जब-जब नजर गड़ाई,
वीर सैनिकों ने तब-तब, शत्रु को धूल चटाई।

हाड़ गलाती सर्दी या हो आग उगलता सूरज,
जान हथेली पर लेकर चलते, खोए बिन धीरज।

देख के उनका साहस, बीहड़ जंगल स्तब्ध रह गया,
धरती क्या अम्बर तक भी, यह देख के चकित रह गया।

बारह घन्टे पैदल चल दुर्गम जंगल को पार किया,
सैनिक केवल साठ, तीन टुकड़ियों में बँट कूच किया।

दस्ता था कुछ दूर अभी, हर तरफ छाई हुई थी धुंध,
तभी अचानक चलने लगीं गोलियाँ अंधाधुंध।

उम्मेद सिंह के पेट और पैर को गोली छेद गई,
लेकिन उनके अटल इरादों को न भेद सकी।

जख्म गहरे हो गए थे, खून रिसता जा रहा था,
किन्तु ये जाँबाज, साथियों को प्रेरित कर रहा था।

साठ सैनिकों ने ही दुश्मन की बजा दी बैंड,
मुक्त हुआ आतंकियों से अपना नागालैण्ड।

मुट्ठी भर सैनिकों ने भारी सेना को धूल चटा दी,
देश बचाने की खातिर जिन्दगानी अपनी मिटा दी।

आतंकियों को मार गिराया ऑपरेशन सफल हुआ,
मातृभूमि को विजय दिला दी, जीवन हार दिया।

वीरगति को प्राप्त हुआ, और अमर हो गया।
काल के कपाल पर नया इतिहास लिख गया।

अद्वितीय नेतृत्व असाधारण वीरता के लिए जाना गया,
मरणोपरांत चक्र अशोक से सम्मानित किया गया।

धन्य है वह धरा, धन्य है वह गाँव,
जिसके वीर पुत्र ने दी माता को शीतल छाँव।

धन्य हुआ वह जिला, शहर और भारत देश महान,
वीर सपूत ने बढ़ा दिया, भारतमाता का मान।
धन्य है उम्मेद सिंह, उम्मीद पूरी कर गए,
स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम अमर कर गए॥

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