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दो बोल मीठे

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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कभी भी बोलचाल बंद व तेवर तीखे मत करना,
संवाद में जब कठोरता व नफरत पनपती है
तो ग़लत बातों का शोर, हमें जल्दी सुनाई देता है,
इसलिए हमें सिर्फ दो बोल मीठे ही बोलना चाहिए।

आज-कल तू-तू मैं-मैं में विश्वास टूटते हुए देखा है हमने,
कोई को ‘अच्छा’ बोलना ठीक नहीं लगता है आज-कल
अब विष पीकर भी नकारात्मकता खत्म नहीं होती है,
बातें नयी हों या पुरानी, दो बोल मीठे बहुत जरूरी है।

पर बोल कड़वे हों तो बिखर जाते हैं सारे रिश्ते-नाते,
क्योंकि दो बोल प्यार के अनमोल होते हैं संसार में।
यह याद रखना है ‘अच्छाई’ में हमें बुराई को नहीं पनपने देना है,
क्योंकि हमें सिर्फ दो बोल मीठे हमेशा बोलना है॥