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धरती को बुखार से बचाएं

डॉ.पूर्णिमा मंडलोई
इंदौर(मध्यप्रदेश)

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विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष………


कितना अजीब लगता है ये शीर्षक पढ़कर-‘धरती का बुखार’ ? जब हमारे शरीर का तापमान बढ़ता है तो हम उसे बुखार कहते हैं,उसी प्रकार धरती का तापमान बढ़ता है तो उसे धरती का बुखार कह सकते हैं। पृथ्वी के इस बढ़े हुए तापमान को विश्व तपन के नाम से जाना जाता है। हमारे और धरती के बुखार के कईं लक्षण व प्रभाव समानता लिए हुए हैं,जिसको इस प्रकार समझा जा सकता है-
-जैसे बुखार में हमारे शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है,वैसे ही धरती के तापमान बढ़ने से कईं हानिकारक गैसों-कार्बन डाइऑक्साइड,ग्रीन हाउस गैसें,ओज़ोन आदि का संतुलन बिगड़ जाता है,जिससे जीव-जन्तुओं का संतुलन भी बिगड़ने लगता है।
-बुखार में हमें भूख नहीं लगने से शरीर में पोषक तत्वों की कमी होने लगती है। ठीक इसी प्रकार पृथ्वी पर तापमान बढ़ने से वर्षा का तरीका बदलने लगता है,सूखे और बाढ़ की स्थितियां बनती है,तब अनाज उत्पादन में कमी आती है।
-बुखार में हमारे शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता कम होने लगती है,जिससे अन्य बीमारियाँ होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी तरह धरती पर वर्षा की कमी एवं सूर्य की बढ़ती तपन से खनिज तत्वों की कमी होने लगती है और भूमि की उर्वर क्षमता में कमी आने से स्वस्थ फसल की पैदावार नहीं हो पाती है।
-जिस प्रकार शरीर का तापमान बढ़ने से रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या में कमी आने लगती है,उसी प्रकार पृथ्वी पर भी वैश्विक पैमाने पर जल संसाधन,भूमि संसाधन,वायुमंडल,जैविक विविधता सभी पर गहरा असर होने लगता है।
-जैसे कभी-कभी बुखार मनुष्य की मृत्यु का कारण भी बन जाता है,वैसे ही धरा के इस तरह बढ़ते ताप के प्रभाव से भी हम नहीं बच पाएंगे।
धरती का बुखार सामान्य नहीं है,इसके अन्दर कईं समस्याएं छुपी हुई हैं। ये वसुंधरा हमारी माँ है। जब माँ बीमार हो या उसे कोई तकलीफ हो,तो उसकी संतान बेचैन हो जाती है। अतः ताप से अवनि(पृथ्वी) की रक्षा करें। हम कुछ छोटे-छोटे प्रयास करके इस ग्रह को बचा सकते हैं एवं भविष्य के लिए सुरक्षित पर्यावरण का निर्माण कर सकते हैं।
आइए कुछ प्रयासों को हम जानें और समझें-
-कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषक पौधों की शिफ्टिंग एग्रीकल्चर को बंद करके अधिक वृक्ष लगा कर उत्पादन को बढ़ा सकते हैं। कोशिश करें कि प्रत्येक घर में एक छायादार घना वृक्ष हो।
-घरों में उपयोग होने वाले अत्यधिक पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नए उपकरणों से बदल कर ऊर्जा की खपत को कम किया जा सकता है।
-पाश्चात्य भोजन को खेत से आपकी प्लेट तक आने मे १५०० माइल्स का सफर तय करना पड़ता है तो सोचिए आप कितनी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं एवं प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। अतः स्थानीय भोजन का उपयोग करना चाहिए।
-चार पहिया वाहनों को मोड़ पर धीरे करना चाहिए। कारों के चलते समय गैसोलीन निकलता है,जो पर्यावरण को गर्म करता है। यदि पहिये हवा से भरे होंगे,तो गैसोलीन कम निकलेगा,इससे वैश्विक तपन कम होगी।
-प्रति सप्ताह में दो दिन अपने निजी वाहनों को घर पर छोड़कर सार्वजनिक परिवहन साधन का उपयोग कर प्रतिवर्ष १५९० पाउण्ड्स कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोका जा सकता है।
-कॉम्पैक्ट फ्लोरोसेंट बल्ब का उपयोग करना चाहिए,जो साधारण प्रकाश से एक चौथाई कम ऊर्जा का उपयोग करते हैं।
-नवीनीकरण संसाधन जैसे पवन ऊर्जा,सौर ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाना चाहिए।
-घरों में टी.वी.,कम्प्यूटर,मोबाईल चार्जर आदि के स्विच बंद कर प्लग से भी निकालना चाहिए। इससे अधिक मात्रा में हम वातावरण को ठंडा रखने में मदद कर सकते हैं।
-शॉवर एवं नलों के बहाव को कम करके हम ५० प्रतिशत तक पानी बचा सकते हैं।
-कागज,काँच,धात्विक पदार्थ,प्लास्टिक आदि को कम उपयोग कर,उन्हें पुनः उपयोग में लाकर एवं पुनः चक्रण करके ७०-९० प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत कर प्रदूषण को कम कर सकते हैं। हम सभी का यह कर्तव्य है कि,अपने आसपास इस समस्या के प्रति लोगों को जागरूक करें एवं समस्या के निदान के उपायों का प्रचार-प्रसार करें। लोगों को ऊर्जा की कम खपत और प्रदूषण कम करने के लिए प्रेरित करें।
इस तरह छोटे-छोटे (ठोस)कदम उठाकर एवं जीवनशैली में परिवर्तन कर हम बीमार और बुखार से ग्रस्त ‘पृथ्वी’ को स्वस्थ कर पर्यावरणीय भीषण संकट से सफलतापूर्वक निपट सकते हैं,लेकिन अभी नहीं जागे और समय निकल गया तो ये प्रयास भी कुछ नहीं कर पाएंगेl ऐसे में हमारा जीवन और आने वाली पीढ़ी दोनों खतरे में पड़ जाएंगे। आओ इस धरा को स्वस्थ रखने का हृदय से संकल्प लें।

परिचय-डॉ.पूर्णिमा मण्डलोई का जन्म १० जून १९६७ को हुआ है। आपने एम.एस.सी.(प्राणी शास्त्र),एम.ए.(हिन्दी), एम.एड. करने के बाद पी.एच-डी. की उपाधि(शिक्षा) प्राप्त की है। वर्तमान में डॉ.मण्डलोई मध्यप्रदेश के इंदौर स्थित सुखलिया में निवासरत हैं। आपने १९९२ से शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पद पर लगातार अध्यापन कार्य करते हुए विद्यार्थियों को पाठय सहगामी गतिविधियों में मार्गदर्शन देकर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई है। विज्ञान विषय पर अनेक कार्यशाला-प्रतियोगिताओं में सहभागिता करके पुरस्कार प्राप्त किए हैं। २०१० में राज्य विज्ञान शिक्षा संस्थान(जबलपुर) एवं मध्यप्रदेश विज्ञान परिषद(भोपाल) द्वारा विज्ञान नवाचार पुरस्कार एवं २५ हजार की राशि से आपको सम्मानित किया गया हैl वर्तमान में आप जिला शिक्षा केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर सहायक परियोजना समन्वयक के रुप में सेवाएं दे रही हैंl कई वर्ष से लेखन कार्य के चलते विद्यालय सहित अन्य तथा शोध संबधी पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कविता प्रकाशित हो रहे हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य अपने लेखन कार्य से समाज में जन-जन तक अपनी बात को पहुंचाकर परिवर्तन लाना है।