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नदी नाराज़ है

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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नदियाँ यह नाराज़ है कहती
हमसे अपने मन की बात,
मैंने तो तुम सबके हित में
सदा दी तुमको सौग़ात।

कभी न समझा मेरा सपना
क्या मैं तुमसे आस करूँ ?
नहीं वेदना समझी मेरी
किससे मैं फ़रियाद करूँ।

सदा प्रवाहित की गंदगी
किया अशुद्ध मुझे जी-भर,
यह तो नहीं तुम्हारे हित में
कभी न सोचा जीवनभर।

मैं तो बहती अलख जगाती
बाँट रही जीवन की धार,
तुम सब लगे हो दूषित करने
किसकी हानि, न समझे सार।

बात नदी ने कही पते की
सोच के देखो मन में आप,
अपनी ही तो हानि है इसमें
समझे नहीं क्यों हम यह बात।

करना होगा स्वच्छ नदी को
हित इसमें ही है सबका,
कूड़ा-कचरा मत डालो
बस यह प्रण हो आपका।

पूजित है यह नदी सदा ही,
अपना हित इसमें जानो।
शुद्ध स्वच्छ पानी होगा तब,
सबका हित इसमें मानो॥