ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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मेरा नाम ममता है, सभी से मेरी समता है,
ऊँच-नीच का भेद न मानूं, चाहे ये जग हँसता है।
सभी बड़ों का करूँ सम्मान, छोटों से भी प्यारा रिश्ता है,
अमीर-गरीब को मैं न जानूं, बस भावों की तो चिंता है।
जहां भी मुझको प्यार मिले, उनसे ज्यादा मेरा नाता है,
मैं किसी का न करूँ अपमान, चाहे कोई मेरा दिल दुखाता है।
मैं खुद में कभी रो लेती हूँ, फिर खुद में जोगी रमता है,
जितना सहना हो, सह लेती हूँ, यही तो मेरी सफलता है।
मैं लड़ाई-झगड़े से दूर रहूं, चाहे संसार ये लड़ता है,
मुझमें नहीं कोई चालाकियाँ, इसलिए हर कोई उल्लू समझता है।
दूसरों की गलती मैं माफ करूँ, अब कौन चिंता में रहता है,
ईर्ष्या-द्वेष से दूर रहूं मैं, अब कौन इसमें जलता है।
जहां मुझको कुछ मिलता मौका, उसे सीखना-समझना होता है,
मैं आगे-आगे बढ़ती जाऊं, फिर पीछे कौन अब मुड़ता है।
हाँ, मुझमें कुछ खास नियम नहीं, पर मैं अनुशासनहीन नहीं,
जब जी चाहे, कोई काम करूँ, यही तो मेरी स्वतंत्रता है॥