वाराणसी (उप्र)।
भारतीय काव्य परंपरा आजश्र धार की तरह वैदिक युग से आज तक प्रवाहित हो रही है। निश्चय ही वह प्रायः छान्दस रही है। भारतीय काव्य परम्परा में डॉ. शम्भुनाथ नवगीत के दैदीप्यमान नक्षत्र थे।
यह विचार उ.प्र. लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य एवं आध्यात्मिक विद्वान प्रो. देवी प्रसाद टोकरा ने डॉ. शंभूनाथ सिंह शोध संस्थान, महामना मदनमोहन मालवीच हिंदी पत्रकारिता संस्थान एवं डॉ. शंभुनाथ सिंह शोध एवं सूजन पीठ महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं डॉ. शंभूनाथ सिंह नवगीत पुरस्कार समारोह में मुख्य अतिथि के नाते व्यक्त किए।
सारस्वत अतिथि केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के कुलपति प्रो. वांगचुक दोरजी नेगी रहे।
संगोष्ठी का बीज वक्तव्य रखते हुए प्रख्यात नवगीतकार और समीक्षक डॉ. इन्दीवर ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चाता साठोत्तरी कविता में छंद परंपता को श्रव्य कह खारिज किया जाने लगा। दरअसल इस दशक में इन विचारों का अनुकरणा करने वाले हिंदी के कवि भारतीय जनता और उसकी परम्पराओं से कटे हुए लोग थे, जबकि डॉ. शम्भुनाथ सिंह का मानस भारतीय परिवेश भारतीयता की आत्मा और आर्ष ज्ञान परम्परा में रचा-बसा था।
विशिष्ट अतिथि के रूप में देहरादून से वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा, कि डॉ शम्भुनाथ सिंह ने भारतीय कविता में आयातित संस्कृति के विरुद्ध निराला द्वारा प्रवर्तित नवगीत का उन्नयन करने में स्वयं को समर्पित कर दिया।
अध्यक्षता करते हुए विद्यापीठ के कुलपति डॉ. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि डॉ. शम्भूनाथ सिंह द्वारा रचित कुलगीत ‘विद्या के सिद्धपीठ जय महान है, जय-जय हे चिर नवीन, चिर पुराण है’ आज भी प्रासंगिक होने के साथ-साथ हमारे विद्यार्थियों में नित नवीन ऊर्जा का संचार करता है।
उद्घाटन सत्र के पश्चात सत्रों में प्रो. उमेश प्रसाद सिंह, प्रो. रामसुधार सिंह, हिमांशु उपाध्याय, प्रो. ओमप्रकाश सिंह (जे.एन.यू.), डॉ. शैलेन्द्र सिंह एवं प्रो. वन्दना मिश्र आदि ने भी वक्तव्य दिए।