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नसीब

राधा गोयल
नई दिल्ली
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औरत औरों को रोशनी देने के लिए,
जलती रहती है…
मोम-सी पिघलती है,
शायद जलना, पिघलना और फिर खाक हो जाना ही उसका ‘नसीब’ है।

जब-जब उसने ऊँची उड़ान भरनी चाही,
समाज और अपनों ने ही राह में रोड़े अटकाए
फिर उसे किसी की कही बात याद आई,
“कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता”
फिर क्यों ऐसी ख्वाहिश पालना,
क्यों न ‘समर्पित’ होकर अपना कर्तव्य निभाती रहे
लेकिन क्या उसके समर्पण करने से…
सब-कुछ ठीक हो जाएगा ?

नहीं…
अपने अधिकारों का पता भी होना चाहिए,
किसी ने कहा है-
“अधिकार भीख में नहीं मिलते,
अधिकार बढ़ के छीने जाते हैं
लेकिन अधिकार बाद में…
पहले पूर्ण समर्पण भाव से,
केवल कर्तव्य मार्ग पर चलना है।”

शादी होते ही औरत का किरदार बदल जाता है,
एकसाथ कई किरदार निभाने होते हैं
बदलते किरदारों के साथ…
जिन्दगी भी बदल जाती है,
वह घर की …
अवैतनिक नौकर बनकर रह जाती है
इसमें भी खुश रहती है,
क्योंकि पति को ही सर्वस्व मान लेती है
सारे दु:ख अपने में समेट लेती है,
सबकी सेवा करती है
लेकिन…
बदले में क्या मिलता है ?
तारीफ ???
नहीं…बिल्कुल नहीं या बहुत कम
अवहेलना ?
हाँ…अवहेलना ही प्रचुर मात्रा में मिलती है
वह अवैतनिक चाकर…
अपने कर्तव्य मार्ग से विमुख नहीं होती।

जब-जब दुखी होती है,
उसके जहन में ये पंक्तियाँ कौंधती हैं-
“धरती की तरह हर दुख सह ले,
सूरज की तरह तू जलती जा।
सिन्दूर की लाज निभाने को,
चुपचाप तू आग पे चलती जा॥”

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