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न्याय की भाषा के लिए भारतीय भाषाओं को राजकाज में स्थापित करना होगा- न्यायमूर्ति कोकजे

संगोष्ठी….

मुम्बई (महाराष्ट्र)।

सरकार अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ शासन-प्रशासन के कामकाज में हिंदी भाषा अख्तियार कर ले तो हिंदी सहज तौर पर न्याय की भाषा भी बन जाएगी।
पूर्व राज्‍यपाल तथा पूर्व न्‍यायधीश (उच्‍च न्‍यायालय) विष्‍णु सदाशिव कोकजे ने केंद्रीय हिंदी संस्थान, विश्व हिंदी सचिवालय तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार की ओर से आयोजित ई-संगोष्ठी में यह बात कही। ‘न्यायपालिका में भारतीय भाषाएँ’ विषयक इस संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए पूर्व न्यायमूर्ति ने कहा कि निरंतर समृद्ध हो रही हिंदी भाषा के इस दौर में औपनिवेशिक गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी का वर्चस्व अनादिकाल तक बरकरार रहने की धारणा तार्किक नहीं है, क्योंकि भाषा काल सापेक्ष होती है। भारत में पहले संस्कृत प्रचलित थी। अंग्रेजों के आने के बाद उर्दू की जगह अंग्रेजी को तवज्जो मिली। तभी से न्यायालयों सहित अन्य कामकाज में अंग्रेजी प्रयुक्त होने लगी। अब अगर अनुकूल माहौल में हिंदी राजकाज की भाषा बनती है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि धीरे-धीरे इसका चलन न्याय के क्षेत्र में भी मजबूत होने लगेगा। उन्होंने दो टूक कहा कि जो लोग एक भाषा में निष्‍णात होते हैं उन्हें दूसरी भाषा में भी काम करने में कोई दिक्कत नहीं होती। आज हिंदी का बाजार दुनिया भर में फैल रहा है। बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए हिंदी का सहारा ले रही है। राजकाज में हिंदी को बढ़ावा दिया जाए तो हिंदी बढ़ेगी।
बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्र ने बात रखते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल देश के लिए यह विडंबनापूर्ण है कि यहाँ की जनता को जनता की भाषा में न्याय नहीं मिलता है। आजादी के ७५ साल पूरे होने के बाद भी हम हिंदी को न्यायालयों व अन्य प्रशासनिक कामों में वह जगह नहीं दिला पाए। श्री मिश्र ने संस्थान की इस पहल को सार्थक बताते हुए उच्चतम न्यायालय सहित देश के सभी छोटे-बड़े न्यायालय में हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए सरकार से अपील करने तथा आवश्यक संघर्षों में साथ देने का आश्वासन दिया।
इससे पहले पटना उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता इंद्रसेन प्रसाद ने कहा कि हिंदी देश के मौलिक अधिकार की भाषा है। वर्ष १९८८ से ही राजभाषा की वकालत कर रहे श्री प्रसाद ने कहा कि देश की बड़ी अदालतों में हिंदी में काम करना अभी भी बहुत कठिन है क्योंकि अदालतों द्वारा अनुवाद माँगा जाता है। अनुवाद माँगना गुलामी का प्रतीक तो है ही, इससे न्याय भी महँगा हो रहा है, और कई बार गलत अनुवाद के कारण न्याय में बाधा उत्पन्न हो रही है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि अनुच्छेद ३४८ को भी संविधान से बाहर का रास्‍ता दिखा देना चाहिए।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील नवीन कौशिक ने कहा कि दुनिया भर में भारत ही एक ऐसा देश है। जहाँ के लोगों को न्याय उनकी भाषा में नहीं मिलता है। वर्तमान समय में केंद्र की सरकार हिंदी भाषा के अनुकूल है। हरियाणा सरकार की ओर से भी हरियाणा के न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग बढ़ने संबंधी प्रस्ताव भेजा गया है। सामान्य प्रशासन प्रशासन की भाषा अगर हिंदी हो जाए तो न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग जल्दी से शुरू हो जाएगा।
वरिष्ठ पत्रकार व भाषासेवी राहुल देव ने वर्तमान में अंग्रेजी के वर्चस्व की बात करते हुए कहा कि हमें अंग्रेजी के साथ ही हिंदी के विकास और प्रसार का काम करना होगा, क्योंकि अंग्रेजी की जड़ इस देश में इतनी गहरी हो चुकी है कि अभी निकट भविष्य में अंग्रेजी हट नहीं सकती। उन्होंने कहा कि इसके लिए हमें चरणबद्ध तरीके से काम करने होंगे। न्यायालयों में हिंदी भाषा के लिए हमें कानून के विद्यालयों से शुरुआत करनी होगी। पाठ्यक्रम हिंदी में बने, हिंदी में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षक तैयार किए जाए तभी अदालतों में हिंदी का प्रयोग बढ़ेगा।
संगोष्ठी को सानिध्‍य दे रहे केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने कहा कि भाषा हमेशा दीवानगी और जुनून की माँग करती है। वर्तमान में हिंदी के प्रति राज तथा समाज दोनों में उत्साह बढ़ा है। उन्होंने बताया कि अभियान्त्रिकी में उच्च शिक्षा के लिए गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम तैयार कर लिया गया है, वहीं मध्यप्रदेश में चिकित्सा की पढ़ाई हिंदी में किए जाने का भी मार्ग प्रशस्त हुआ है। श्री जोशी ने कहा कि देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा और राज्यसभा की कार्रवाई जब हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में हो सकती है, तो न्यायालयों में भी इसे मूर्त रूप दिया जा सकता है।
संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए प्रो. राजेश कुमार ने प्रस्तावना प्रस्‍तुत की। भुवनेश्वर के क्षेत्रीय निदेशक रंजन दास ने अतिथियों का स्वागत किया तथा परिचय दिया। संचालन करते हुए ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ के निदेशक डॉ. एम एल गुप्ता ‘आदित्य’ ने कई प्रश्न खड़े किए। उन्होंने कहा कि किस प्रकार संविधान का अनुच्छेद ३४८ संविधान के अनुच्छेद ३४३, ३४५ और ३५० को उपेक्षित करते हुए न्यायपालिका को भारत संघ और जनतंत्र से अलग और ऊपर स्थापित करता है। सुनीता पाहुजा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुम्बई)

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