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पर्यावरण सरंक्षण अति आवश्यक

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर(राजस्थान)
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प्रकॄति और खिलवाड़…

भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले ही हमें समझा दिया था कि, जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश इन पाँचों तत्वों से ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है, जिसका सीधा अर्थ है कि, जंतु, पेड़-पौधे और हम मनुष्य सभी इन पंच-तत्वों के संयोग से ही पैदा हुए हैं। इसलिए इन पाँचों में संतुलन बना रहे, यह हम सभी की जिम्मेदारी है, क्योंकि संतुलन से ही पर्यावरण सब तरह से अनुकूल रहेगा।
भारत के संविधान में पर्यावरण का विशेष उल्लेख होने के कारण हमारा देश विश्व के उन गिने-चुने देशों में शुमार है, जिनके संविधानों में पर्यावरण का विशेष उल्लेख है। इसलिए ही हमारे यहाँ व्यापक पर्यावरणीय कानून मौजूद हैं यानि हमारी नीतियाँ पर्यावरण संरक्षण में भारत की पहल दर्शाती हैं।इसके बावजूद हमारे यहाँ पर्यावरण की स्थिति काफी गंभीर है, क्योंकि नाले, नदियाँ तथा झीलें औद्योगिक कचरे से भरी हुई हैं।
इस संतुलन बिगड़ने के कुछ बड़े कारणों पर चर्चा करें तो बहुत कुछ दृष्टिगोचर होगा-
वनों व वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई जिसके चलते जंगल खाली होने लगे और पशु-पक्षियों के लिए भी संकट पैदा कर दिया है। वृक्षों का ही अभाव है कि आए दिन पर्वतों की चट्टानें खिसकने और गिरने की घटनाएं सामने आती हैं। इसके साथ विभिन्न प्रकार की खनिज सम्पदा, पत्थर आदि का अंधाधुंध दोहन भी असंतुलन का एक बड़ा कारण बन गया है। बीते दिनों में उत्तराखंड के जोशीमठ में जमीन धंसने से अनेक मकानों सहित काफी माल-असबाब का नुकसान देखने कों मिला, जबकि कुछ साल पहले ही बद्रीनाथ जी व केदारनाथ जी की तरफ जो भयंकर त्रासदी हुई, वह सब इसी असंतुलन का ही परिणाम था। पर्यावरण असंतुलन के परिणामस्वरूप ही हमें बिहार में आते साल भीषण बाढ़ देखने को मिलती है, हालाँकि वहाँ वाली बाढ़ के लिए हमारा पड़ोसी नेपाल भी बहुत हद तक दोषी है। इसलिए जान लीजिए कि, पेड़-पौधे जीवन को बचाने में ही नहीं, अपितु पर्यावरण को सुरक्षित रखने में भी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं।
ऐसा माना जाता है कि, जितना जल संसार में है, उतने ही प्रतिशत जल इस शरीर में है, लेकिन दुनिया की बेतहाशा बढ़ती आबादी ने सम्पूर्ण विश्व में जल पर गहरा संकट उत्पन्न कर दिया है। इसलिए, जल का संतुलन भी बहुत आवश्यक है। जल के उपयोग एवं प्रदूषण में उद्योगों की एक बहुत बड़ी भूमिका है। उद्योग वाले तो सोचते ही नहीं हैं और सारा कचरा तालाबों या नदियों में धड़ल्ले से डाल देते हैं, जिसके चलते तालाब-नदियाँ प्रदूषित भी हो रही हैं और जनता के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। इस प्रकार हमें जल के साथ अपनी पृथ्वी को भी बचाना होगा।
जल भण्डारण को ध्यान में रखते हुए दूरगामी समाधान के रूप में विभिन्न बड़ी नदियों को आपस में जोड़ने से बहुत लाभ मिलेगा।
यह स्पष्ट है कि, हमारा पर्यावरण धरती पर स्वस्थ जीवन को अस्तित्व में रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए, पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल और केवल मनुष्य के जिम्मे है। कृतयुग में ही संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक चौपाई लिख पूरी मानव जाति के सामने पर्यावरण का सही खाका खींच दिया था और उसे आज के वैज्ञानिकों ने स्वीकारा ही नहीं, बल्कि मान्यता भी दी है-
“क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा।
पंच रचित अति अधम सरीरा॥”

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