Visitors Views 14

पापा की तलाश

जितेन्द्र वेद 
इंदौर(मध्यप्रदेश)
*************************************************************
मम्मी,मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी भीड़ से आमना-सामना होगा। सब तरफ लोग ही लोग। इतने लोगों के बीच पापा को ढूंढना कुछ ऐसा ही है जैसे भूसे के ढेर में से सुई का पता लगाना। फिर तकनीक के इस जमाने में चुंबक की मदद से सुई तो जैसे-तैसे ढूंढी जा सकती है,पर पापा…। उन्हें तो मैंने कभी देखा ही नहीं या देखा भी हो तो कुछ याद नहीं। जब वे अपनी जड़ों की तलाश में भारत भागे थे,तब मैं बहुत छोटी थी और अब मुद्दतें गुजर गई। सूरिनाम की नदियों में से कितना पानी बह चुका होगा,नहीं पता और यहाँ बनारस किनारे भी गंगा में पानी बह रहा है लगातार बदनुमा कीचड़भरा। वहाँ पर माना जा रहा था कि बनारस एक जापानी शहर की तरह सुंदर होगा,पर सच बिलकुल अलग है एक गंदा-सा शहर और उसके घाट। इन घाटों पर साधुओं की भरमार,जिनके लंबी-लंबी दाढ़ियाँ और झाड़ियों जैसे बाल। शरीर पर कभी-कभी नीचे वाले भाग पर कोई गंदा-सा कपड़ा दिख जाता है,अन्यथा नंग-धड़ंग। दीवारों पर सब जगह लाल निशान-कहते हैं,यहाँ के लोग एक किसम का पत्ता खाते हैं और जब-तब यहाँ-वहाँ थूक देते हैं।
समझ में नहीं आता कि इतनी बदबूदार जगह पर लोग कैसे रहते होंगे। हो सकता है-पापा भी इनमें से कोई हो,पर पहचानना बिलकुल नामुमकिन।
पापा का भागना उनके लिए होम कमिंग होगी। वे यही मानकर अपनी जडों से जुड़ने के लिए भारत लौटने की बात कर रहे होंगे,पर सच तो यह है कि आप जैसी नीग्रो लड़की से उनकी शादी किसी को अच्छी नहीं लगी थी और इसको सहन करने की उनमें हिम्मत नहीं थीl फिर कुछ दिनों के लिए ही सही वे आपसे और परिवारवालों से पीछा छुड़ाने के नाम पर पलायनवाद को स्वीकार कर अपनी मातृभूमि को ढूंढने की बात कर वहाँ से चल दिए। वे भले ही चीनी बाप और हिंदुस्तानी माँ की हाइब्रिड औलाद थे,पर उन्हें लगातार डर लग रहा होगा कि उनकी और नीग्रो औरत के बच्चे कैसे होंगे। यह डर उन्हें कहीं ना कहीं सता रहा होगा। कहीं इस डर की वजह से ही तो उन्होंने बुध्द की तरह अपनी नीग्रो यशोधरा को…।
आपने बताया था कि पापा अपने चीनी बाप की तरह लगते हैं,इसलिए मैंने घाट-घाट पर घूमते हुए पूरी कोशिश की कि साधु का चेहरा पढ़कर अंदाज लगा सकूँ,पर दाढ़ी के पीछे क्या है,समझ में आता ही नहीं। जहाँ भी लगा कि बंदा चीनी हो सकता हैं,मैने नी हाओ कहकर उत्तर पाने की कोशिश की पर सब कुछ बेकार। कहीं से भी उत्तर आया ही नहीं।
बनारस से मैं लखनऊ के पास एक छोटे से गाँव शिवपुर भी गई थी। सोचा था पापा अपनी जड़ों की तलाश की धुन में वहाँ भी गए हो,पर वहाँ भी कुछ पता नहीं चला। इतना जरूर पता चला कि एक शिवरतन के दादा के बड़े भाई जहाज में कहीं गए थे मजदूरी करने। और उनके लड़के का लड़का आया था एक बार वापस सूरिनाम से वापस अपने दादा की खेती में हिस्सा मांगने,पर उसकी यहीं एक दुर्घटना में मौत हो गई। फिर मामला वहीं खत्म। कहा जाता है कि उसकी हत्या उसके ही एक चचेरे भाई ने करवाई थी,जिससे आगे कोई हिस्सा मांग न सके। लाश का कोई पता न चला और सूरिनाम में रह रहे बीवी-बच्चों की आँखें थक गई राह देखते-देखते। उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि भारत आकर तलाश कर सकें अपने पति की। धीरे-धीरे बात जहाँ से चली थी,वहीं खत्म हो गई।
लगता है कि पापा को यह बताने की ख्वाहिश अधूरी ही रह जाएगी कि उनके पलायनवादी रवैये के बावजूद हम कुछ बन गए हैं। वे भारत में अपनी जड़ों की तलाश में हमें समूल उखाड़कर फेंक गए थे,पर इधर-उधर बिखरी जड़ें अपने आसपास की हवा-पानी लेकर फिर जमीन में अंदर तक फैल गई हैं। केवल अंदर ही नहीं,इस उपजाऊ भूमि का सत्व लेकर ये ऊपर से भी हरी-भरी दिख रही हैं। मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हूँ और छोटा भाई हालैंड में आई.टी. इंजीनियर हैं। माँ आधा वैधवस्य को स्वीकार कर चुकी है और जीवन के संध्याकाल में उनकी कोई इच्छा भी नहीं है। कभी सूरिनाम तो कभी हालैंड। भाई ने डच लड़की से शादी कर ली है। माँ को भले ही अच्छा न लगा हो,पर उन्होंने बिलकुल भी मुँह नहीं खोला। भाषाई दिक्कत न होने के कारण उनकी जुगलबंदी अच्छी चल रही हैं,पर यहाँ लोग इतने दुबले हैं कि लगता है लाशों में तब्दील हो गए हैं,पर पापा की तलाश में इन लाशों में से गुजरना जरूरी है,पर,….”एवरीथिंग इज सो नाउसिएटिंग,आय डोंट हेव प्रापर वर्डस टू एक्सप्लेन।” तलाश….तलाश…और तलाश,एक ऐसी शख्सियत की जिसने आपको,मुझे और भाई को ही नहीं जन्म देने वाली माँ को भी काफी पहले ठुकरा दिया है। और ठुकराया भी उस चीज के लिए जिसका वजूद केवल और केवल कागजों पर है।
यह सच है कि,हमारे पूर्वज यहाँ आए थे दाना-पानी की तलाश में,और यह सच सिर्फ इतिहास बन चुका है और उस इतिहास के लिए जिंदा लोगों की बलि चढ़ाना कहाँ की समझदारी है। आपको याद है कि आपको एक फिल्म बहुत पसंद थी गाइड। इसमें नायक गड़े मुर्दों की तलाश में अपनी प्रेमिका को परेशान करता रहता है। इसी फिल्म में वहीदा रहमान गाती है-काँटों से खींच के ये आँचल….। तो क्या भूत की तलाश अपने-आप को भूतहा महल में ले जाने की तरह नहीं हैं,पर जो गलती पापा ने की वही मैं भी तो कर रही हूँ। भूत को दफनाने के बजाय उसका फिर पता लगाने निकल गई हूँ। इस मामले में तो पापा की ही गलती दोहरा रही हूँ।
तो क्या मैं अपनी तलाश छोड़कर वापस सूरिनाम लौट जाऊँ ? यह करना तो डरपोक जैसा काम होगा और इस पलायनवाद के लिए लोग क्या मेरा कान नहीं पकडेंगे। हो सकता है पापा सूरिनाम से भारत आए ही नहीं हों। शादी के बाद पारिवारिक खौफ से बचने के लिए उन्होंने यूँ ही कह दिया हो। आखिरकार परिवार का डर सबको सताता है और पुराने जमाने में यह ज्यादा ही होता था। पूर्वज भारत छोड़कर भले ही आए हों,पर मानसिकता जो वही होगी ना। जात-पात के बंधन कोई जमीन से जुड़े तो नहीं होते हैं। वे तो दिलो-दिमाग पर छाये रहते हैं बरसों-बरस।
जब मैं बीसवीं शताब्दी के अंत में नीग्रो से शादी करने का परिणाम झेल रही हूँ तो पापा को तो कितना सहन करना पड़ा होगा इस शताब्दी के पूर्वार्ध में,तो हो सकता है कि उनके भारत जाने की बात,पूर्वजों के गाँव जाने की बात केवल एक जुमला हो। वैसे भी बनारस में हर कोई जुमला शब्द मजाक में उपयोग करता हैं। किसी भी दुकान पर खड़े हो जाओ लोग किसी न किसी बात पर यह शब्द काम में ले लेते हैं। हो सकता है वे हालैंड में ही कई रूक गए हों। वैसे भी हालैंड सुरिनामवासियों का दूसरा घर हैं। हर दूसरे-तीसरे घर से कोई न कोई वहाँ रहता ही है,तब पापा को वहाँ छुपने,वहाँ पर नई जिंदगी शुरू करने में कोई तकलीफ नहीं हुई होगी,पर हालैंड में तो भाई भी रहता है क्या उसने कभी नहीं देखा होगा अपने बाप को,पर जब मैं ही नहीं पहचानती हूँ तो वह कैसे पहचानेगा। सामने से निकल जाए तो भी उसके लिए पहचानना नामुमकिन होगा।
हो सकता है सोशल मीडिया से कोई पता चले। आजकल कई लोग सोशल मीडिया की मदद से अपने बिछुड़े हुए का पता लगा रहे हैं…पर पापा कोई इतना आधुनिक तो होंगे नहीं कि,अपना फेसबुक खाता बना लें…पर कोशिश करने में क्या हर्ज है। उसे याद आया कि कालेज में कहा जाता था-“होप फार द बेस्ट एंड प्रिपेयर फार द वर्स्ट।”
उसने तत्काल फेसबुक पर पापा के नाम रामलोचन से मिलते-जुलते नामों को खोजना शुरू कर दिया। रामलोचन लिखते ही ढेर सारे नाम सामने आ गए। किसी के पिता के नाम में रामलोचन था,तो किसी के खुद के नाम में रामलोचन। फिर रामलोचन,सूरिनाम…। सूची तीन..चार लोगों पर अटक गई। अब इन तीन-चार में सही ढूंढना उसे मुश्किल लगने लगा। यह भी हो सकता है या वह भी। बिल्कुल शाला में वैकल्पिक प्रश्न की तरह,पर इन चार-पाँच में जरूरी तो नहीं है कि पापा हो भी…। हो सकता है वे इस दुनिया में ही नहीं हो। यदि होते तो क्या कभी याद नहीं करते…।फिर दिमाग ने कहना शुरू किया कि यदि उनके मन में कोई अपनापन होता तो छोड़कर ही क्यों जाते। ये प्यार-व्यार कुछ नहीं मन का भ्रम है। यह केवल आत्मा की चीज है,असली जिन्दगी में ऐसी कोई चीज नहीं होती है।
रामलोचन वाले चार नामों में से दो हाॅलैंड,एक भारत और एक गुयाना का था। उसे पहले लगा कि पापा गुयाना में ही स्थापित हो गए होंगे,पर यदि गुयाना में होने पर कभी-कभी ही सही बीवी-बच्चों की याद उन्हें घर के पास ले आती। आखिरकार गुयाना इतनी दूर तो है नहीं कि आया नहीं जा सकता,फिर उसका नाम भारत वाले रामलोचन पर अटक गया। बनारस के पास एक छोटे-से गाँव में रहने वाला रामलोचन उसका बाप हो,इसकी संभावना उसे बहुत कम लगी,फिर भी उसने उसका प्रोफाइल देखना शुरू कर दिया।
रामलोचन के आगे कुछ वांग लगा हुआ था। वैसा ही चीनी लोगों के आगे लगा रहता है,पर यह शब्द किसी अन्य नाम का अपभ्रंश भी तो हो सकता है। तस्वीर से उम्र का कोई पता नहीं लग रहा था,पर इस बात को मानकर चला जा सकता था कि बंदे की आयु पचास से कम तो कतई नहीं है। फिर बंदा बनारस के पास के ही एक गाँव का था,इसलिए मेहनत की जा सकती थी पता लगाने की,पर यह गाँव है कहाँ,फिर वहाँ पर रहने वाले कैसे समझायेंगे यह सब। क्या वह उनसे बात कर अपने खोये बाप के बारे में बात कर सकेगी और वे उसे सब बतला देंगे। फिर भी उसने हिम्मत कर कार की और निकल गई उस गाँव के लिए। वह गाँव पंडारिया केवल ३५ किलोमीटर दूर था,और गाँव में राजनीतिक माहौल पूरे जोर पर था,चुनाव जो सर पर थे। हर जगह पोस्टर और बैनर। सब तरफ झालरें,आदमकद कट-आउट ,जो उसने कभी नहीं देखे थे।
गाँव में बात करते हुए लगा कि लोग उसे किसी अखबार के लिए काम करने वाली औरत समझ रहे थे। कुछ लोग मेरी जैसी गोरी-चिट्टी लड़की से बात करने के लिए उत्सुक थे तो कुछ लोग मुझसे कन्नी काट रहे थेl
आदमकद कटआउटों के बीच में खुद के लिए जगह खोजना उतना ही कठिन था;जैसे तुसाद के म्यूजियम में जीवित वस्तु को ढूंढ निकालना,पर पापा का पता लगाने के लिए इतनी मशक्कत तो लाजमी थी। उनका खून मेरी रगों में दौड़ रहा था और उस लहू का वजूद का पता लगाना और वह भी बनारस आकर केवल ३५ किमी के फासले तक नहीं जाना साहिल के थोड़ी पहले डूब जाने की तरह था।
मैंने ३-४ लोगों से बात की। पहले तो वे उत्तर देना नहीं चाह रहे थे। कहीं इसका संबध चुनाव से तो नहीं है,कहीं कोई परदेशी औरत कुछ खुलवाना तो नहीं चाहती है। फिर एक रामशरण तिवारी ने बताया कि कोई परदेश से एक व्यक्ति आया था। १०-१२ दिन गाँव में रहा किसी के यहाँ और फिर वापस परदेश चला गया। कहता था उसके बाप-दादे धन कमाने के लिए परदेश गए थे और वहीं पर रह गए। वो न जाने कौन-सी जबान बोलता था। उसके साथ एक औरत और एक छोटा-सा बच्चा भी था,वे आपस में न जाने कौन-सी जबान में बात करते थे। जब उनसे पूछा तो मरद बोला-यह डच है,तुमको समझ नहीं आएगी।
मैंने उनसे पूछा कि फिर वे कहाँ गए तो कोई सही जवाब नहीं दे पाया।
हाँ,इतना जरूर मालूम पड़ा कि वे वापस परदेश चले गए,पर परदेश का कोई भी मायने नहीं बता पाया।
मैंने उनसे पूछा कि वे कैसे दिखते थे तो वे बोले-जैसे मसूरी में रहते हैं वैसे दिख रहे थे। तभी एक बच्चा बोला-चीनी चपटा तो बूढ़े ने अपना मुँह हिला दिया।
इससे मुझे इतना निश्चय हो गया कि हो न हो पापा वहाँ गए थे और वहाँ रूके नहीं। मैंने उनसे पूछा कि साथ में औरत कैसी थी तो एक आदमी बोला-काशी में आने वाली मेम साब जैसी। गोरी चिट्टी…l
मैंने आगे कुछ पूछना मुनासिब नहीं समझा-पर मुझे लगा कि पापा के किसी गोरी औरत से संबंध रहे होंगे और आपसे शादी के बाद पारिवारिक समस्याओं से निजात पाने के लिए उन्होंने घर छोड़ दिया और फिर उसी के साथ रहने लगे होंगे।
मैं कोई जासूस नहीं हूँ,पर अगाथा क्रिस्टी को बहुत पढ़ा है और कई बार दिमाग उस तरह ही काम करने लगता है। जासूस न होने के बावजूद जासूसी कई बार परिस्थितिवश आ जाती है और हमें समाज को एक नए तरीके से देखने में मदद करती है। मैंने और कई लोगों से बात की पर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल रहा थाl मुझे लग रहा था कि पापा डच औरत के साथ यहाँ रहने के बजाय या तो वापस सुरिनाम चले गए होंगे या नीदरलैंड में ही कहीं स्थापित हो गए होंगे। पहली के बजाय दूसरी संभावना ज्यादा थी-कारण वापस अपने देश में एक दूसरी महिला के साथ रहने के अपने खतरे हैं और उन्हें यह भी मालूम है कि अपनी माली हालत अच्छी नहीं है,इसलिए आप पापा के आपके छोड़ने को दुस्वप्न मानकर छोड़ देंगी। इसलिए मैंने इस तलाश के लिए एक बार हाॅलेंड जाने की सोची। मान लो मैं अपनी अंतिम कोशिश में नाकामयाब भी रहती हूँ तो सूरिनाम जाने के लिए हाॅलेंड तो जाना ही पड़ेगा। एक आखिरी कोशिश…l
मैंने वहीं बैठे-बैठे लीडन विश्वविद्यालय में काम कर रहे अपने दोस्त मिश्राजी को फोन किया कि वह फोन निर्देशिका से पता लगाए कि हेग में रामलोचन नाम वाला कोई रहता है क्या और रहता है तो कबसे। उन्हें बतला दिया कि मैं अपने पापा की तलाश में निकली हूँ,जो हमें ३५ साल पहले छोड़कर चले गए थे। मेरे दोस्त साहेबान ने मुझे आश्वस्त किया कि वे इस तलाश में मेरी पूरी मदद करेंगे।
मिश्राजी बोले-अच्छा हो वापस चली आओ। ज्यादा संभावना इस बात की है कि वे यहाँ पर ही होंगे,क्योंकि भारत में जड़ें केवल कागज पर बची है,वास्तव में नहीं। फिर वे भारत में करेंगे क्या। इस बात की कोई संभावना नहीं कि उनके बाप-दादे के पोते-पड़पोते उनकी जमीन का हिस्सा उनको दे देंगे और मान भी लिया जाए कि ऐसा हो सकता है तो क्या वे अपनी गोरी मेम के साथ गाँव में रह पायेंगे। भारत में हर गोरी चमड़ी को हाथ लगाने के लिए हर कोई एक पाँव पर खड़ा रहता है,तब क्या उनके लिए वहाँ रहना महफूज होगा। तब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे हाॅलेंड में ही कहीं रह रहे होंगे। और वह कहीं द हेग हो सकता है।
मैंने उनकी बात कर वापसी की तैयारी शुरू कर दी। मुझे मालूम था कि मिश्राजी बहुत सोच-समझ कर बोलते हैं। बिहार के चंपारन से निकले मिश्राजी ने बीएचयू से एम.ए. और जेएनयू से हिंदी साहित्य में पीएचडी की है। फणिश्वरनाथ रेणु की कहानी -उपन्यास तथा बाबा नागार्जुन की रचनाओं पर बतियाना उनका शगल है। एक बार वे पारामारिबो आए थे भारतीय दूतावास के बुलावे पर और तभी मुलाकात हुई थी। वे यूँ तो बहुत बोलते हैं, पर सिर्फ साहित्यिक विषयों पर,अन्यथा मौनं सर्वार्थ साधनम् में ही उनका विश्वास है।
मैंने तत्काल अपनी नेट पर की गई पुरानी खोजों को उन्हें मेल कर दिया। केवल दो ही तो नाम थे-रामलोचन वाले। हो सकता है फेसबुक वाले नामों के अलावा भी कोई रामलोचन हो सकता है, पर सूची बहुत लंबी नहीं होगी,इसलिए पता लगाना भी कोई ज्यादा कठिन नहीं लग रहा था।
उन्होंने कहा कि मैं अपने तरीके से तीन-चार दिन भारत में बिता सकती हूँ। तब तक टिकट की व्यवस्था भी हो जाएगी और भारत में आगरा,लखनऊ वगैरह देखने का भी समय मिल जाएगा। मुझे उनकी बात समझ में आ गई और लगा कि गेंद अब उनके पाले में है और कुछ न कुछ तो इस तलाश का कोई अंजाम निकलेगा।
मैंने एक- दो दिन के लिए अपनी इस तलाश को कोई अहमियत नहीं देने की सोची,पर दिमाग है कि बार-बार उसी चीज को सोचता रहता है। दूसरे दिन उनका फोन आया कि उन्होंने द हेग में ही एक रामलोचन का पता लगाया है जो सूरिनाम से यहाँ आकर रह रहे हैं काफी सालों से,पर पता नहीं। मेरे पहुँचने के बाद मिलने की कोशिश की जा सकती है। मैंने उस फोन पर सूरिनाम वाले नंबर से फोन लगाने की कोशिश की तो किसी ने नहीं उठाया,पर इंडिया वाला नंबर उठा लिया। मैंने जब उनसे जब अपने बारे में बताकर मिलने की इच्छा बताई तो वे बोले -अब बेताल पचीसी के भूत को पेड़ पर ही रहने दें तो ज्यादा अच्छा होगा। उनके इस नो से बहुत खराब लगा,पर भूत को दफनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मैंने भाई से मिलने की इच्छा में फिर भी द हेग का टिकट खरीद लिया।

परिचय-जितेन्द्र वेद की जन्मतिथि १९ अप्रैल १९६० तथा जन्म स्थान इंदौर हैl आपका वर्तमान निवास भी यहीं हैl मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी माने जाने वाले इंदौर के श्री वेद ने स्नातक की पढ़ाई की हैl कार्यक्षेत्र में आप सरकारी विद्यालय में व्याख्याता एवं हिंदी के शिक्षक(हैदराबाद) भी हैंl आप लेखन की सभी विधाओं में कार्य करते हैंl विभिन्न समाचार पत्रों में आपकी ढेर सारी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैंl आपकी लेखनी का उद्देश्य भावों की अभिव्यक्ति करना हैl