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पेंशन-पीड़ा

संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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वृद्धा अवस्था, विधवा पेंशन, छात्रवृत्ति, सेवानिवृति,
सेना, श्रमिक, किसान, अधिकारी, मंत्री, सांसद-विधायक पेंशन की है आवृत्ति
कहीं है उठती आवाजें ‘एक रैंक एक जीवन भत्तावृत्ति’,
कहीं उठ रही मांगें ‘एक समान काम, क्यों अंतर पेंशन स्वीकारोक्ति।

फिर अंतर क्यों निजी व सरकारी का, बंद हो यह प्रवृत्ति,
देश की खातिर दोनों करते श्रम साध्य, प्रबंध की अभिवृति
नई पेंशन की नई बात से कुछ खुश व कुछ दुखी हैं,
है सरकार की यह संदिग्ध कृति।

यह तय है पेंशन में फिर होगी भारी गलती की पुनरावृत्ति,
बस थोड़ा ढोल बजा देंगे लेकिन देंगे न्यूनतम जैसे छात्रवृत्ति
यह खेल-तमाशा दिखा हमें खुद बना लेंगे अपनी रणनीति,
कर्मचारी पेंशन पर ठप्पा लगते ही बढ़ेगा सांसद-विधायक मंत्री का पेंशन भत्ता, सरकार की बनेगी ऐसी नीति।

जनप्रतिनिधि सब मूक-बधिर बन संसद-विधानसभा में एक मत पारित कर दिखाएंगे यह परिणति,
८० करोड़ जनता को मुफ्त बाँटेंगे खाद्यान-राशन प्रति व्यक्ति
२०२४ के चुनाव जीतने तक ही दिखाएंगे विकास की ये गति,
भले ही दिखती हो आप सभी को विकास की गति।

२०२४ के चुनाव में आप हम मिलकर ही जिताएंगे, फिर बेरोजगारी की होगी प्रगति,
पेंशनधारियों अब रहो अटेंशन, उम्र सीमा न तय हो जाए, ऐसी सरकार की सदगति
सरकारी सेवकों के कारण ही देश के विकास हो गई दुर्गति,
यह मेरी नहीं; भारत सरकार की स्पष्ट है मति।

निजीकरण की बढ़ती मंशा से देश की फैलेगी कीर्ति,
हम भारतीय टाटा, बिरला, अम्बानी, अडानी के साथ जाएंगें विदेश, होगी रोजगार से आर्थिक पूर्ति।
हम विश्वभर में अपनी जनसंख्या से दुनिया को नियंत्रित कर अखंड विश्व की दिखाएंगे यश कीर्ति,
सभी भारतीयों को दुर्घटना और मृत्यु के बाद शव विदेश व जहाज से लाएंगे और सरकार देगी परिजन को पेंशन या क्षतिपूर्ति॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएससी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता, रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुंबई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़ें हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में आपको
महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२० २३ सहित अन्य सम्मान हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले संजय सिंह ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज- पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”