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प्रतिरोध की ज़रूरी कविताओं के कवि हैं कुम्भज

इंदौर (मप्र)।

कुम्भज जी की कविताएँ पाठक को विचार से जोडती है। ये कविताएँ आपको जन समाज से जोड़ती हैं, जिनमें प्रतिरोध को स्पष्टता से देखा जा सकता है।
वरिष्ठ व्यंग्यकार जवाहर चौधरी ने यह बात शनिवार को जनवादी लेखक संघ इन्दौर इकाई के मासिक रचना पाठ के ११४ वें क्रम में वरिष्ठ कवि राजकुमार कुम्भज के कविता पाठ के आयोजन में उनके निवास स्थान पर कही। आयोजन में सबसे पहले कुम्भज जी की ४७ वीं कविता पुस्तक ‘दुर्गम इलाकों से गुज़रते हुए’ का लोकार्पण किया गया। तत्पश्चात उन्होंने अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया।
इसके बाद चर्चा में चुन्नीलाल वाधवानी ने इन कविताओं को सच्चाई और सुन्दरता की कविता के रूप में रेखांकित किया। रंगकर्मी नंदकिशोर बर्वे ने कहा कि, यह कविताएँ हमें हमारे भविष्य के प्रति भी आगाह करती हैं। वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने कहा कि, कुम्भज जी जिस तरह कविता में नज़र आते हैं, वैसे ही जीवन में भी हैं। उन्होंने कहा कि यह इन्दौर का सौभाग्य है कि उसे राजकुमार कुम्भज जैसा कवि मिला है। प्रदीप मिश्र ने कहा कि कुम्भज जी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी पत्रिका में आपको नज़र आते हैं जो कवि के रूप में उनकी जन स्वीकृति है। उनकी कविताओं में कहीं विश्वास और आस्था हैं, तो कहीं संघर्ष और प्रतिरोधों की बानगी। संघ के सचिव प्रदीप कान्त ने बताया कि, कार्यक्रम में डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल, विभा दुबे, शिरीन भावसार, नेहा लिम्बोदिया सहित अन्य कई लोग उपस्थित रहे। आभार देवेन्द्र रिणवा ने माना।

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