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बदलते रंग-रामभरोसे के संग

कार्तिकेय त्रिपाठी ‘राम’
इन्दौर मध्यप्रदेश)
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आज वर्तमान परिवेश में व्यक्ति के जीवन में रंगों की अहमियत बढ़ती ही जा रही है,फिर वह होली के रंग हों,मुस्कानों के रंग हों,या आध्यात्म के रंग,बस रंगों का होना ही जीवन की सार्थकता को सही मुकाम देता है।
फिर भी नित्य नए रंग बदलती इस बहुरंगी दुनिया में होली का नाम सुनते ही हमारे मन का तार-तार इस कदर आनंद विभोर हो जाता है, मानो शहद की कड़ाही में हमारे विचारों की गठरी नहाकर आई हो। वो वासंती बेला,फाग का मद भरा दृश्य,टेसू के फूलों की महक के साथ प्रेम और वात्सल्य से सनी हुई फगुनाहट की होली गुझियों की गर्म घी में तकरार से उठती महक हमारी होली को चार चाँद लगा देती है। हमारा मन भी बरबस हवाओं के साथ अठखेलियों में मशगूल हो जाता है,थोड़ा हास्य, थोड़ी मस्ती भरी टेर स्थानीय लोकगीत और ढोल की थाप पर मोहक छटा बिखेरते नृत्य अजीब-सी गर्माहट हमारे मनोभावों में उत्पन्न कर देते हैं। दूसरी ओर चहकती कोयल,मदमाती,इठलाती अल्हड़ किशोरियों का शोर और विभिन्न रंगों में डूबे उनके चेहरे अकस्मात उनका हमारे नजदीक आना और फिर हमारे कपोलों पर लरजते हाथों से अबीर मल देना,तो कभी भावों के समंदर में नहाकर हमारा अपनी प्रियतमा को रंग और अबीर से सराबोर करना,फिर उनका हमारे आगोश में लजाकर सिमट जाना तो दुनियाभर के सारे रंगों को बेरंग कर देता है।
उस दिन हम जरूरत से कुछ ज्यादा ही खुश थे,और मोहल्ले में भी पूरे हर्षोल्लास के साथ होलीकोत्सव मनाने के लिए बेसब्र हो रहे थे। वह होली थी जो हमें किसी के अपना होने का एहसास दिलाती थी,निमंत्रण देती थी, और हम भी बिना किसी तकल्लुफ के इन पलों को कभी जाया नहीं करते।
लाल,नीले,हरे,गुलाबी,बैंगनी,जामुनी,केसरिया,पीले इत्यादि रंगों में भेद करना भले ही हम उतना नहीं जानते,पर जब प्रयोग की बारी आती तो सारी भूल-भुलैया से परे होकर पिकासो व मकबूल फिदा हुसैन की तरह विपक्षी चेहरे को कैनवास बना देने में तनिक-भी कोताही नहीं बरतते।
अभी सूरज अपने पूरे यौवन पर भी नहीं था कि,हमने अपने चेहरे और बालों को पर तनिक तेल चढ़ा लिया,जिससे विपक्षी रंगरेजों का रंग हमारी चमड़ी को ज्यादा प्रदूषित ना कर पाए। अलग-अलग डिब्बों में तरह-तरह के रंग सोंपदानी के मानिंद भरकर हम पूरी तरह से सज्जित हो गए,मानो किसी रण क्षेत्र की और कूच कर रहे हों। मिशन कश्मीर की तरह इस बार हमारा पहला लक्ष्य थे हमारे लंगोटिया यार हमसखा,किसी छुट्टे सांड की तरह मुटियाते राम भरोसे,जिन्हें होली नाम से ही सख्त चिढ़ थी। यह दिन वर्ष में एक बार उनके लिए अघोषित कर्फ्यू का रूप अख्तियार कर लेता था। वे होली के रंगों से इस कदर घबराते थे जैसे कोई नई नवेली दुल्हन घर की चौखट पार करने में हौले-हौले लजाती है,हिचकिचाती है,या फिर कोई नया-नया नेता आश्वासन देने में बार-बार अटकता है,लेकिन हम भी कोई कम घाघ नहीं थेl हमने भी उन्हें रंगने की ठान ली तो ठान ली। यही नहीं,इस मिशन की पूर्णता के लिए हमने थोड़ी भंग भी छान ली।धड़धडा़ते-लड़खड़ाते कदमों से अपने संगी-साथियों के साथ हम उनके भवन के मुख्य द्वार पर जा पहुंचे,जहां एक बड़ा-सा अलीगढ़ी ताला लटक रहा था। अकस्मात झुंड में खड़े भाई नयन सुख की चाक-चौबंद आँखों ने कोने में खुले पिछले दरवाजे पर हलचल होने का संकेत दिया,और कुछ ही पलों में हम सब वहां उपस्थित थे।
वे वहां असमंजस में खड़े अपलक हमें निहारने लगे,हमारे इरादे और हाथों में रंग देखकर उनके चेहरे का रंग फक्क (सफेद) हो गया।
वातावरण में व्याप्त नीरवता को भंग करते हुए हम बोले -“रंगों की बौछार सहने के लिए तैयार हो जाओ,तुम्हारे हाँ कहते ही हम तुमको रंग में रंगने के लिए टूट पड़ेंगे।”
इतना सुनते ही रामभरोसे का चेहरा एक बार फिर गुलाबी हो गया, क्योंकि वे तो सपने में भी किसी को रंग लगाने का नहीं कहते। उनकी प्रसन्नता की खुमारी का कारण उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रहा था। रामभरोसे ने बैंगनी खींसें निपोरते हुए कहा-“इन कमबख्त रंगों को देख कर तो मुझे बेहोशी-सी छाने लगती है,क्या मामला कुछ खा-पीकर निपटाया नहीं जा सकता ?”
रामभरोसे का मिजाज देखते ही अकस्मात हमें उनकी पत्नी रामप्यारी की याद आ गई,मिजाज में रूमानियत लाकर चहकते हुए हमने पूछा,-“भाभी जी कहां है ?”
सुनकर उनका चेहरा तमतमाते लोहे की मानिंद लाल हो गया।
वे बोले-“रंग भी क्या कोई खेलने की चीज है,जो रंगने पर तुले हो।” हमने भी इंसानियत से तनिक परे होकर भौंहें तानते हुए आवेश में कहा-“वैसे भी तुम्हारे स्याह चेहरे पर कोई रंग नहीं फबेगा,और रंग बेकार जाएगा सो अलग।”
वे निराश होकर बोले-“फिर क्यों हमें शर्मिंदा करते हो कार्तिकेय भाई।”
रामभरोसे के शर्म में गढे़ पीले चेहरे को देखकर हम खुद अचंभित रह गए। जब बिना रंग खेले इन पर इतने रंग मेहरबान हैं,और हमने भूले से भी इन पर कोई और रंग मल दिया तो…यह सोचकर पहले तो हमें अपने आप पर…फिर उन सतरंगी रंगों पर बेहद गुस्सा आया,और हम बिना कहीं रंग खेले बैरंग लौटती डाक की तरह अपने संगी-साथियों के साथ अपने घर की और कूच कर गएl उनके साथ फिर कभी रंग ना खेलने की शपथ लेकर..।

परिचयकार्तिकेय त्रिपाठी का उपनाम ‘राम’ है। जन्म ११ नवम्बर १९६५ का है। कार्तिकेय त्रिपाठी इंदौर(म.प्र.) स्थित गांधीनगर में बसे हुए हैं। पेशे से शासकीय विद्यालय में शिक्षक पद पर कार्यरत श्री त्रिपाठी की शिक्षा एम.काम. व बी.एड. है। आपके लेखन की यात्रा १९९० से ‘पत्र सम्पादक के नाम’ से शुरु हुई और अनवरत जारी है। आप कई पत्र-पत्रिकाओं में काव्य लेखन,खेल लेख,व्यंग्य और फिल्म सहित लघुकथा लिखते रहे हैं। लगभग २०० पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। आकाशवाणी पर भी आपकी कविताओं का प्रसारण हो चुका है,तो काव्यसंग्रह-‘ मुस्कानों के रंग’ एवं २ साझा काव्यसंग्रह-काव्य रंग(२०१८) आदि भी प्रकाशित हुए हैं। काव्य गोष्ठियों में सहभागिता करते रहने वाले राम को एक संस्था द्वारा इनकी रचना-‘रामभरोसे और तोप का लाईसेंस’ पर सर्वाधिक लोकप्रिय कविता का पुरस्कार दिया गया है। साथ ही २०१८ में कई रचनाओं पर काव्य संदेश सम्मान सहित अन्य पुरस्कार-सम्मान भी मिले हैं। इनकी लेखनी का उदेश्य सतत साहित्य साधना, मां भारती और मातृभाषा हिंदी की सेवा करना है।