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ब्रह्माण्ड में…मैं कुछ भी तो नहीं

संदीप धीमान 
चमोली (उत्तराखंड)
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विराट इस ब्रह्माण्ड में
मैं कुछ भी तो नहीं,
तू अनन्त में समाया
मैं तुच्छ भी तो नहीं।

हूँ सूक्ष्म से भी सूक्ष्म
मैं बुद्ध भी तो नहीं,
समझ सकता जो माया
वैसा शुद्ध भी तो नहीं।

अल्प बिंदु का भी बिंदु
पूर्ण बिंदु भी तो नहीं,
तेरी विराट इस माया में
मैं कुछ भी तो नहीं।

धरा विराट, सूर्य सम्राट
संग तारे कितने ही घाट,
दमके पतंगा अग्नि भी
वैसा, मैं कुछ भी तो नहीं।

मरना, जीना हाथ नहीं अस्तित्व
ब्रह्माण्ड किनारा पास नहीं।
तेरी चरणधूली भी मुझसे भारी,
तेरी माया के आगे मैं तुच्छ, कुछ भी तो नहीं॥

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