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भयमुक्त होकर अभिलाषा जगाएं

मुकेश कुमार मोदी
बीकानेर (राजस्थान)
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एक बहुचर्चित चलचित्र का प्रचलित संवाद है ‘‘जो डर गया, समझो मर गया।‘‘ यानी डरने वाला व्यक्ति कोई भी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता, क्योंकि वह तो मरने से पहले ही मरे समान है।
भोजन, पानी और श्वांस जीवन के ३ मूलभूत आधार हैं। इन्हें पूर्ण करने की हद तक हर प्राणी चाहे वह पशु-पक्षी हो, मनुष्य हो या कोई जीव-जन्तु हो, सबका जीवन स्तर एक समान होता है। मनुष्य को इन मूलभूत आवश्यकताओं के अतिरिक्त बहुत कुछ चाहिए, किन्तु बिना उद्यम के कुछ भी प्राप्त करना सम्भव नहीं।
हर मनुष्यात्मा शारीरिक, भौतिक, पारिवारिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर अनेक अभिलाषाओं को परिपूर्ण करने के लिए नैसर्गिक रूप से उद्यम तो करती है, किन्तु सबको उनकी प्राप्ति का सौभाग्य नहीं मिलता।
अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए उद्यम प्रारम्भ करते ही प्रतिदिन अनेक रूपों में विघ्न, बाधाओं और समस्याओं से हमारा परिचय होने लगता है। समस्याओं का रूप एक समान होते हुए भी इनका सामना करना किसी के लिए आसान और किसी के लिए कठिन होता है।
जिस प्रकार अभिलाषाओं की पूर्ति हर व्यक्ति को प्रिय है, उसी प्रकार अभिलाषाओं को भी उन्हें चाहने वाले व्यक्ति प्रिय है। दुनिया के सभी प्रकार के सुख, सम्पदा, वैभव आदि भी स्वयं को किसी के द्वारा भोगे जाने की प्रतीक्षा करते हैं, किन्तु ऐसी पात्रता रखने वाले मनुष्य दिखाई ही नहीं देते।
भोजन, पानी और हवा के लिए हर प्राणी नैसर्गिक रूप से उद्यम करके उन्हें प्राप्त कर ही लेता है, किन्तु इससे अधिक कुछ चाहिए तो उद्यम का स्तर बढ़ाना ही पड़ता है। अभिलाषाओं के सागर में जितना आगे जाएंगे, उद्यम भी उतना ही अधिक करना होगा और उतनी ही ऊंचाई और तीव्र बाधाओं रूपी लहरें भी उत्पन्न होगी।
अक्सर लोग अपनी अभिलाषाओं को पूर्ण करने में असफल होते हैं, क्योंकि मार्ग में आने वाली समस्याएं उन्हें मगरमच्छ जैसी खतरनाक महसूस होती है, जिससे मन में डर का प्रार्दुभाव होता है।
यदि कोई सोचे कि, मैं किसी समस्या का सामना नहीं कर सकता या उस पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता, तो यह उसके मन की दुर्बलता है। मैं किसी समस्या या विघ्न पर विजय प्राप्त कर सकूंगा या नहीं, यह मन का अर्न्तद्वंद्व है। मैं ये करूं या वो करूं, यह मन की दुविधा है। तीनों ही अवस्थाओं में भय का संस्कार धीरे-धीरे इतना प्रबल हो उठता है, जो हमारी हिम्मत, उमंग और उत्साह को निर्जीव कर देता है, और यही असफलता का सबसे बड़ा कारण बनता है।
यदि किसी पहाड़ी पर चढ़ना है, तो गिरने की आशंका अवश्य होगी, लेकिन सावधानीपूर्वक चलने से चोटी पर पहुंचना कठिन नहीं होता है। गिरने का भय ही व्यक्ति को आगे बढ़ने नहीं देता। मार्ग में आने वाले संकटों के प्रति मन में उत्पन्न भय पर आक्रमण करके उस पर विजय प्राप्त करना ही छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी सफलता का रहस्य है।
भय के संस्कार से ग्रसित लोग खतरों से बचकर जीने का मार्ग खोजते हैं। ये लोग अनेक अभिलाषाएं मन में पालकर भी उनको पूर्ण नहीं कर पाते। इनका जीवन साहस रहित, आशाहीन और निस्तेज होता है, जो केवल मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति की सीमा तक ही जीकर मर जाते हैं। ऐसे लोग भय रूपी कारागृह के ऐसे बन्दी हैं, जो साहस के अभाव में जीवन के रोमांचकारी क्षणों और अनुभवों से जीवन पर्यन्त वंचित रहते हैं।
यदि व्यक्ति अपनी दिनचर्या तक ही सीमित रह जाए तो मानव सभ्यता का क्या होगा ? रोज नींद से जागकर वही नौकरी या दुकान पर जाना, काम करना, पैसा कमाना, घर आना, परिवार के साथ वक्त बिताना, खाना खाकर सो जाना और फिर अगले दिन भी वही सिलसिला कायम रखना जीवन का उद्देश्य नहीं है। यदि हर मनुष्य ऐसा जीवन जीने लगा तो मानव सभ्यता, मानवीयता का विकास नहीं हो सकता और न ही सामाजिक परिवर्तन और पुर्नजागरण की कोई क्रान्ति हो सकती है, लेकिन भय और मानसिक निर्जीवता के कारण कोई भी इस दिनचर्या रूपी दायरे से बाहर निकलना ही नहीं चाहता।
यह सही है कि, खतरों का सामना करने से हानि होने की सम्भावना रहती है, किन्तु ऐसा केवल मानसिक अनाड़ीपन और असावधानी के कारण ही होता है। यदि लापरवाही और नासमझी में कोई बिजली के तारों को छूता है तो अवश्य उसे करंट लगेगा, किन्तु सावधान व्यक्ति कभी ऐसा धोखा नहीं खा सकता।
देखा जाए तो खतरा या संकट केवल मन में उपजी हुई एक कल्पना मात्र है, जो हमारे हौंसले को दुर्बल बनाकर असफलता का कड़वा स्वाद चखाती है। यदि खतरे की ही बात करें तो सबसे बड़ा खतरा या संकट प्राणों का होता है, क्योंकि प्राण सबको प्रिय है, किन्तु यह कटु सत्य है कि प्राण एक दिन शरीर से अवश्य निकलेंगे।
संसार में जितने भी साहसी और महान व्यक्तियों ने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वे सब उन्होंने मृत्यु के भय से मुक्त होकर प्राप्त की हैं। दूसरी तरफ ऐसे लोगों की भरमार है जो भय के कारण मृत्यु से पहले ही मृतक सदृश्य नजर आने लगते हैं, जो मृत्यु आने तक स्वयं और मृत्यु पश्चात परिजन रोते हैं।
पढ़ने वालों ने भगवत गीता में अनेक बार पढ़ा होगा कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है और जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म निश्चित है। फिर मन में मृत्यु के प्रति इतना भय क्यों बैठा है ? जीवन तो उसी का है, जो मृत्यु के भय से मुक्त होकर खुद को ऐसी मिसाल बनाए जो लोगों के हृदय में सम्मान के साथ विराजमान होकर सदियों तक जीवित रहे।
हर आदमी अक्सर यही सोचता है कि वह धन-सम्पदा से भरपूर हो, रहने के लिए उसके पास बड़ा मकान हो, सभी भौतिक साधन उपलब्ध हो, नौकर-चाकर हो जो उसकी आज्ञा का पालन करे और हर कोई उसे देखकर कहे कि देखो कितना शानदार जीवन जी रहा है। उसकी अभिलाषाओं की सीमा यहीं तक रहती है। ऐसे लोगों का जीवन भले ही औरों को लुभाता हो, किन्तु उनकी मृत्यु एक साधारण इंसान के समान ही होती है, जिसे कुछ ही दिनों में भुला दिया जाता है ।
कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपनी मृत्यु के बाद जीवित रहना चाहते हैं। ऐसे लोग सांसारिक तुच्छ अभिलाषाओं का आकर्षण त्यागकर ऐसी दुर्लभ उपलब्धियों से स्वयं को भरपूर करने में विश्वास रखते हैं, जो सम्पूर्ण विश्व को लाभान्वित करते हुए उन्हें आत्म संतुष्टि का अनुभव कराती हैं। ऐसे लोग मरते दम तक कुछ ना कुछ उपलब्धि अर्जित करने के उद्यम में लगे रहते हैं। ऐसे जूनूनी लोगों के कारण ही जीवन रोमांचकारी और आकर्षक बनता है, जो जीवन को अर्थपूर्ण बनाने के साथ साथ समाज को भी नई दिशा देने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
इसलिए सभी संकटों और खतरों से भयमुक्त होकर कुछ नई उपलब्धि हासिल करने की अभिलाषा और उत्कण्ठा मन में जगाएं, सुनियोजित ढ़ंग से उसे प्राप्त करने का उद्यम करें, अपने जीवन को रोमांचकारी और यादगार बनाएं।

परिचय – मुकेश कुमार मोदी का स्थाई निवास बीकानेर में है। १६ दिसम्बर १९७३ को संगरिया (राजस्थान)में जन्मे मुकेश मोदी को हिंदी व अंग्रेजी भाषा क़ा ज्ञान है। कला के राज्य राजस्थान के वासी श्री मोदी की पूर्ण शिक्षा स्नातक(वाणिज्य) है। आप सत्र न्यायालय में प्रस्तुतकार के पद पर कार्यरत होकर कविता लेखन से अपनी भावना अभिव्यक्त करते हैं। इनकी विशेष उपलब्धि-शब्दांचल राजस्थान की आभासी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त करना है। वेबसाइट पर १०० से अधिक कविताएं प्रदर्शित होने पर सम्मान भी मिला है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-समाज में नैतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करना है। ब्रह्मकुमारीज से प्राप्त आध्यात्मिक शिक्षा आपकी प्रेरणा है, जबकि विशेषज्ञता-हिन्दी टंकण करना है। आपका जीवन लक्ष्य-समाज में आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों की जागृति लाना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-‘हिन्दी एक अतुलनीय, सुमधुर, भावपूर्ण, आध्यात्मिक, सरल और सभ्य भाषा है।’

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