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भारत की अघोषित राजभाषा, राज्यभाषा व राष्ट्रभाषा है ‘अंग्रेजी’

डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’
मुम्बई(महाराष्ट्र)
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गणतंत्र दिवस विशेष-१

भारत में जब भी भाषा की बात होती है तो सबसे पहले राष्ट्रभाषा और राजभाषा पर बहस प्रारंभ हो जाती है। सभी भारतवासी भली-भांति जानते हैं कि स्वतंत्रता के समय हिंदी ने स्वतंत्रता संग्राम के संपर्क की भाषा की भूमिका अदा की थी और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, विनोबा भावे, सरोजिनी नायडू, आचार्य कृपलानी, सुब्रमण्यम भारती, रविंद्रनाथ टैगोर सहित विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों और विद्वानों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकारते हुए इसे भारत की राष्ट्रभाषा की रूप में विकसित करने का भरपूर प्रयास किया था। उस समय देशवासियों की यह भावना थी कि स्वाधीनता के पश्चात देश का काम देश की भाषाओं में चले और अंग्रेजी को भी अंग्रेजी की तरह विदा किया जाए, लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात जब भारत के संविधान निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ तो प्रारंभ में राष्ट्रभाषा की बात हुई। संविधान बनते-बनते काफी जद्दोजहद और राजनीतिक वाद- विवाद चला, हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर भी काफी खींचतान हुई। अंत में हिंदी को भारत की राजभाषा बनाया गया। तमाम बहस से यह भी निकल कर आया कि संविधान सभा में एक वर्ग ऐसा भी था, जो अंग्रेजी को बनाए रखना चाहता था। इनमें उन लोगों की प्रमुख भूमिका थी, जो इंग्लैंड से पढ़ कर आए हुए विलायती बाबू थे, जिनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सर्वोपरि थे, लेकिन उस समय जन-भावनाएं प्रबल रूप से स्वाधीनता के साथ-साथ स्वभाषा के पक्ष में थीं इसलिए उन्हें सीधे-सीधे नकारना संभव नहीं था। इसलिए अंततः जब संविधान बनकर तैयार हुआ तो हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा के बजाय राजभाषा बनाया गया। इसी प्रकार राज्यों में भी राज्यों की भाषाओं को राज्यों की राजभाषा बनाने के उपबंध किए गए। आम जनता को तो यही समझ में आया कि राष्ट्रभाषा और राजभाषा शायद एक ही बात है। इसलिए आज भी यदि किसी सामान्य व्यक्ति से यह पूछा जाए कि भारत की राष्ट्रभाषा क्या है तो वह हिंदी को ही बताएगा।
आज भी हिंदी के कार्य से जुड़े लोगों के बीच राजभाषा और राष्ट्रभाषा को लेकर अनेक शंकाएँ हैं। हिंदी और राजभाषा के कामकाज से जुड़े अनेक वरिष्ठ लोगों को भी मैंने अक्सर यह कहते सुना है- ‘अरे भाई क्या फर्क पड़ता है, आप हिंदी को राजभाषा कहें या राष्ट्रभाषा करें बात तो एक ही है’, लेकिन वास्तव में दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। भारत संघ की राजभाषा की ही नहीं बल्कि राज्यों की राजभाषा की भी है। इसलिए दोनों का अंतर समझने की आवश्यकता है।
राजभाषा शब्द का अंग्रेजी में समानार्थी शब्द है ऑफिशियल लैंग्वेज अर्थात अधिकारिक भाषा। संघ की राजभाषा का अर्थ है संघ के कामकाज की अधिकारिक भाषा। वह भाषा जिसमें संघ का कामकाज किया जा सकता है ? इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है कि राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क के लिए हिंदी का प्रयोग किया जाना है। इस प्रकार भारत की कोई राष्ट्रभाषा या राष्ट्रीय संपर्क भाषा नहीं है।
इस प्रश्न पर अक्सर विद्वान लोग यह कहकर बात समाप्त कर देते हैं कि जनता तो किसी भी भाषा में संवाद कर सकती है, भाषा तो सरकारी काम के लिए ही तय करनी होती है। यह बात सत्य है, लेकिन अर्धसत्य है। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जब कोई भी भाषा राष्ट्रभाषा अर्थात राष्ट्रीय संपर्क की भाषा नहीं है और राज्यों के स्तर पर कोई भी भाषा राज्य-भाषा अर्थात राज्य के स्तर पर संपर्क की भाषा नहीं है तो विभिन्न कानूनों के अंतर्गत जो सूचनाएँ जनता को दी जानी आवश्यक हैं, भले ही वे शासन के द्वारा हों, किसी निजी संस्था द्वारा हों या किसी व्यक्ति के द्वारा उनकी भाषा क्या होगी ? यदि संविधान और विधान द्वारा राज्य की कोई संपर्क भाषा नहीं, राष्ट्र की कोई संपर्क भाषा नहीं तो विभिन्न कानूनों के अंतर्गत जनता को उसके हितों की रक्षा के लिए सूचनाएँ प्राप्त करने के अधिकार प्राप्त होते हैं, वे उन्हें कैसे मिल सकते हैं ? क्योंकि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं और राज्यों में भारत की भाषाएँ भारत की राजभाषाएँ हैं, वे राज्य की संपर्क भाषा नहीं हैं।
अब यह प्रश्न पूछना भी स्वभाविक है कि जब भारत की कोई भाषा कानूनी रूप से भारत की राष्ट्रभाषा अर्थात राष्ट्रीय संपर्क भाषा नहीं है, तो राष्ट्रभाषा की जगह पर किसका कब्जा है ? भारत की राष्ट्रीय संपर्क भाषा क्या है ? राज्यों की संपर्क भाषाएँ या राज्य भाषाएँ क्या हैं ? इस बात को यूँ समझा जा सकता है कि भारत में अक्सर ऐसा होता है कि कोई जमीन जिसे कोई देखने वाला नहीं, अगर वह खाली पड़ी हो तो उस पर कुछ दबंग किस्म के लोग, अधिकारियों और नेताओं की मिलीभगत से कब्जा कर लेते हैं। कुछ समय पश्चात उनका कब्ज़ा स्थायी हो जाता है। फिर उन्हें वहां से हटाना असंभव-सा हो जाता है। हमारे देश में भाषाओं के साथ भी यही हुआ। भारत में राष्ट्रीय संपर्क भाषा और राज्य संपर्क भाषा की खाली जमीन पर अफसरशाही, राजनीति के समर्थन से अंग्रेजी ने अवैध कब्जा जमा लिया है। अंग्रेजी तो संविधान की अष्टम अनुसूची में भी शामिल नहीं है। संविधान के अनुसार हिंदी भारत संघ की राष्ट्रभाषा या राजभाषा भी नहीं है। नागालैंड को छोड़ दें तो अंग्रेजी किसी राज्य की राज्य भाषा या राजभाषा भी नहीं है, लेकिन स्थिति इसके उलट है। संघ के स्तर पर और राज्यों के स्तर पर संपर्क भाषा की जमीन पर अंग्रेजी का अवैध कब्जा है। स्वतंत्रता के पश्चात पिछले ७५ वर्षों से यह कब्जा मजबूत होता गया है। वास्तव में तो अंग्रेजी हिंदी ही नहीं, भारत की किसी भी भाषा से बहुत अधिक शक्तिशाली बना दी गई है। संविधान में किसी स्थान पर न होने के बावजूद अंग्रेजी न भारत की, बल्कि भारत के हर राज्य के कामकाज की ही नहीं, बल्कि कानूनी उद्देश्यों के लिए भी संपर्क भाषा बना दी गई है। इसलिए अब विभिन्न कानूनों के अंतर्गत अनिवार्य रूप से दी जाने वाली सूचनाएँ आदि निजी कंपनियों, व्यक्तियों आदि द्वारा प्राय: केवल अंग्रेजी में ही दी जाती हैं। शासकीय स्तर पर भी प्रायः स्थिति कोई बहुत अधिक भिन्न नहीं है। राज्यों के स्तर पर या देश के स्तर पर हर जगह अगर कोई भाषा है तो वह केवल अंग्रेजी है। यह किसने या किस-किस ने कब-कब और क्यों किया इस पर अलग से चर्चा हो सकती है, लेकिन यह साक्षात है कि अंग्रेजी को भारत की राजभाषा और राष्ट्रभाषा घोषित किए बिना और राज्यों में अंग्रेजी को वहां की राजभाषा या राज्य भाषा घोषित किए बिना हर जगह उसका कब्जा करवा दिया गया है। इसके लिए अंग्रेजी के पक्ष में तो कानूनी व्यवस्था की गई या फिर भारत की जनता और भारतीय भाषाओं के पक्ष में जो कानूनी व्यवस्था की जानी थी वह नहीं की गई।
भारत की जनता को इसके कई बहुत बड़े नुकसान होते रहे हैं जिसके कारण इनके विभिन्न और राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क भाषा न होने से राष्ट्रीय एकता और पारस्परिक संवाद पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। जब राष्ट्र है तो राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई संपर्क भाषा न हो, यह विश्व में किसी की भी समझ से परे होगा, लेकिन भाषावाद और क्षेत्रवाद की राजनीति ने अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए निरंतर राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करते हुए न केवल राष्ट्रभाषा का विरोध किया, बल्कि देश की जनता के विभिन्न कानूनी अधिकारों के हनन की भी अनदेखी की है। यहाँ मामला केवल भारत की राष्ट्रभाषा का ही नहीं, बल्कि राज्य स्तर पर राज्य संपर्क भाषा अर्थात राज्य की भाषा का भी है।
आगे चलकर जहाँ एक और भारतीय भाषाओं को परस्पर लड़ाया गया, कई राज्यों में राजनेताओं और स्वार्थी तत्वों द्वारा हिंदी के विरुद्ध वातावरण तैयार किया गया, इससे सब परिचित हैं। आज भी विभिन्न राज्यों में समय-समय पर भाषा के नाम पर बांटने का खेल चलता रहता है। हिंदी भाषी राज्यों में भी आगे चलकर बोलियों को भाषा के समान अष्टम अनुसूची में शामिल करने के लिए किस प्रकार क्षेत्रवाद की राजनीति और पुरस्कारों की होड़ तथा लाभ-लोभ के कारण क्या कुछ नहीं हुआ ? लेकिन इन सबके अतिरिक्त शायद एक और बात कहीं-न-कहीं छिपी हुई है जो सामने नहीं आती। वह यह है कि अंग्रेजी के साम्राज्य के लिए भारतीय भाषाओं को लड़ाते रहने का षडयंत्र। इसका परिणाम यह है कि भारतीय भाषाएं लड़ रही हैं, अंग्रेजी बढ़ रही है। अंग्रेजी के एकाधिकार के लिए यह बहुत ही आवश्यक और अनुकूल है कि भारतीय भाषाएं परस्पर मिलकर बढ़ने के बजाय परस्पर लड़ती रहें।
इसलिए देश के किसी भी भाग में वहाँ की जनता को सभी प्रकार की समुचित सूचनाएं प्राप्त हों, उन्हें शोषण-अन्याय-धोखाधड़ी से बचाना हो अथवा उनमें स्वाभिमान भरना हो तो यह आवश्यक है कि राज्यों के स्तर पर राज्य की राजभाषा को राज्य की राज्यभाषा अर्थात राज्य की आधिकारिक संपर्क भाषा बनाया जाए। यह भी आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रभाषा अर्थात राष्ट्रीय संपर्क भाषा बनाई जाए। कहने का आशय यह है कि सरकारी क्षेत्र हो या निजी क्षेत्र विभिन्न कानूनों के अंतर्गत दी जाने वाली सूचनाएं अनिवार्य है राज्य और संघ की भाषा में दी जानी चाहिए।
सच तो यह है कि भारत में राज्यों के स्तर पर या देश के स्तर पर शासन-प्रशासन के स्तर पर, संघ और राज्यों के बीच या न्याय के स्तर पर अथवा देश के सभी नागरिकों को राज्यों में अथवा राष्ट्र के स्तर पर कोई सूचना दी जानी हो तो अंग्रेजी भाषा के माध्यम से कहीं कोई कठिनाई नहीं है, लेकिन ऐसी स्थिति भारत की किसी भी भाषा की नहीं है। यह कहना अनुचित न होगा कि भारत संघ और भारत के सभी राज्यों की अघोषित राजभाषा और राष्ट्र व राज्यों की संपर्क भाषा अंग्रेजी है।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई)

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