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मंगलमय ऋतुराज उदय हो

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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बसंत पंचमी विशेष….

नव वसन्त तिथि पंचमी शुभा,
पावन दिन मधुमास मधुर है।
पूजन-अर्चन विनत ज्ञानदा,
विद्याधन अभिलास मधुर है।

सरस्वती माॅं भारत मुदिता,
हंसवाहिनी अम्ब जगत है।
धवल पुष्प धारित श्वेत वसन,
ज्ञान सिन्धु जगदम्ब सतत है।

लय गति सुर धुन तालित ललिता,
चतुर्वेद आधार जगत् है।
विद्या चौदह हेतु जगत माँ,
सरस्वती माॅं सुखदायक है।

भक्ति प्रेम रस भाव विनत मन,
करूँ आरती जगदम्बा है।
पाऊँ ज्ञानालोक सुयश मन,
शरणागत माँ अवलम्बा है।

शीश नवल गोधुम आम्र मुकुल,
ऋतु फल तृण बेलपत्र पुष्प है।
श्रीखंड चन्दन श्वेत वसना,
पूजन माता दीप धूप है।

वीणा पाणी शारदे शुभ्रा,
स्वागत माघी ऋतु वसन्त है।
वर दे पूत माॅं अपराजिते,
ज्ञानसिन्धु गरिमा अनन्त है।

दे वीणा स्वर ज्ञान सिन्धु माँ,
बजा तार जो मधुरिम स्वर है।
सदाचार संस्कार मनुज दे,
सजा ज्ञान श्रृंगारित रब है।

शारदा शरदाम्बुज शुभदे,
हरो तिमिर अज्ञान शोक है।
शान्ति सुखद मुस्कान सुयश जग,
दो विद्याधन रत्न लोक है।

पाप त्रिविध संसार तप्त जग,
मिटा तिमिर दे दिव्य ज्ञान है।
देशभक्ति अनुराग हृदय नित,
जन-सेवा ही महादान है।

वसन्तोत्सव प्रमुदित हृदया माँ,
नया शोध प्रेरक उन्नत है,
मानव मूल्यक बन पथ सारथ,
चलूँ प्रीति पथ,बस मिन्नत है।

दया क्षमा करुणा हृदयस्थल,
साहस धीर विनीत नीत है।
कर्मवीर संयम यायावर,
वर दे माॅं जगमीत गीत है।

वासन्तिक जीवन ज्ञान मुदित,
कुसुमित विद्या मन सुगन्ध है।
लोभ शोक मद मोह धन तजूॅं,
मनुज आज फॅंस स्वार्थ अन्ध है।

अर्पित सरसिज चरण वन्दना,
मातु भारती कल्याणी है।
तिथि वसन्त शुभ पंचमी दिवस,
विपद लोक से जन त्राणी है।

सदा सर्वदा पूज्य शारदा,
कृपासिंधु यशलोक स्रोत है।
ब्रह्माणी महाशक्ति विजया,
अज्ञानी तम ग्रस्त शोक है।

माघी शारद पूर्णिम आगम,
नव वसन्त निशिकांत मुदित है।
ज्ञान ज्योति निशि खिली चन्द्रिका,
खिली प्रगति सुख शांत उदित है।

वर दे अम्ब वीणावादिनी,
मंगलमय ऋतुराज उदय हो।
खिले कीर्ति की अरुणिम बेला,
हरित क्रांति शुभ भारतमय हो॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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