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मन बाग-बाग होता

जबरा राम कंडारा
जालौर (राजस्थान)
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कभी-कभी इच्छानुरूप कुछ होता और सुहाता है,
मन बाग-बाग होता, मन का मौसम बन जाता है।

हर बात मन को भाती, कुछ-कुछ होने लगता है,
सब-कुछ अच्छा लगता, खुशी दीप जगमगाता है।

सपने जो संजोए थे मन, सच वो जब हो जाते हैं,
हर कोई फूला नहीं समाता, मंद-मंद मुस्कुराते हैं।

जब मंजिल मिल जाती है, शेष कुछ नहीं रहता है,
मन का मौसम बन जाता, सुख समीर बहता है।

खुशी के आँसू नैनों में, खुशनुमा चेहरा लगता है,
प्रेम-गंगा बहे दिल में, सोया स्वाभिमान जगता है॥

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