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महिला दिवस की सार्थकता

डॉ.रीता जैन’रीता’
इंदौर(मध्यप्रदेश)

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‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ स्पर्धा विशेष…………………


महिला दिवस एक मज़दूर आंदोलन से उपजा है। इसका बीजारोपण साल १९०८ में हुआ था,जब १५ हज़ार औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मार्च निकालकर नौकरी में कम घंटों की मांग की थी। इसके अलावा उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए। एक साल बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ अमरीका ने इस दिन को पहला ‘राष्ट्रीय महिला दिवस’ घोषित कर दिया।स्तनपान कराती महिला की तस्वीर पर बहस क्यों?
‘मैं जितनी अकेली हूँ,उतनी ही आत्मनिर्भर भी’ ये विचार एक औरत का ही था। क्लारा ज़ेटकिन ने १९१० में कोपेनहेगन में कामकाजी औरतों के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान
‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाने का सुझाव दिया। उस वक्त सम्मेलन में १७ देशों की १०० औरतों ने इस सुझाव का समर्थन किया।
सबसे पहले साल १९११ में ऑस्ट्रिया,डेनमार्क,जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया था, लेकिन तकनीकी तौर पर इस साल हम १०७ƒवां अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं।१९७५ में महिला दिवस को आधिकारिक मान्यता उस वक्त दी गई थी,जब संयुक्त राष्ट्र ने इसे वार्षिक तौर पर एक थीम के साथ मनाना शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पहली थीम थी ‘सेलीब्रेटिंग द पास्ट,प्लानिंग फ़ॉर द फ्यूचर’,
लेकिन अब महिला उत्थान को महत्व का विषय मानते हुए कई प्रयास किए जा रहे हैं,और पिछले कुछ वर्षों में महिला सशक्तिकरण के कार्यों में तेजी भी आई है। इन्हीं प्रयासों के कारण महिलाएं खुद को अब दकियानूसी जंजीरों से मुक्त करने की हिम्मत करने लगी हैं। सरकार महिला उत्थान के लिए नई-नई योजनाएं बना रही हैं,कई गैर सरकारी संगठन भी महिलाओं के अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने लगे हैं,जिससे औरतें बिना किसी सहारे के हर चुनौती का सामना कर सकने के लिए तैयार हो सकती हैं।
आज की महिलाओं का काम केवल घर-गृहस्थी संभालने तक ही सीमित नहीं है,वे अपनी उपस्थिति हर क्षेत्र में दर्ज करा रही हैं। व्यापार हो या पारिवार, महिलाओं ने साबित कर दिया है कि वे हर वह काम करके दिखा सकती हैं,जो पुरुष समझते हैं कि वहां केवल उनका ही वर्चस्व है, अधिकार है।
जैसे ही उन्हें शिक्षा मिली,उनकी समझ में वृद्धि हुई। खुद को आत्मनिर्भर बनाने की सोच और इच्छा उत्पन्न हुई। शिक्षा मिल जाने से महिलाओं ने अपने पर विश्वास करना सीखा और घर के बाहर की दुनिया को जीत लेने का सपना बुन लिया,एवं किसी हद तक पूरा भी कर लिया,लेकिन पुरुष अपने पुरुषत्व को कायम रख महिलाओं को हमेशा अपने से कम होने का अहसास दिलाता आया है। वह कभी उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ करता है तो कभी उस पर हाथ उठाता है। समय बदल जाने के बाद भी पुरुष आज भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना पसंद नहीं करते,उनकी मानसिकता आज भी पहले जैसी ही है। विवाह के बाद उन्हे ऐसा लगता है कि अब अधिकारिक तौर पर उन्हें अपनी पत्नी के साथ मारपीट करने का लाइसेंस मिल गया है। शादी के बाद अगर बेटी हो गई तो वे सोचते हैं कि उसे शादी के बाद दूसरे घर जाना है तो उसे पढ़ा-लिखा कर खर्चा क्यों करना, लेकिन जब सरकार उन्हें ‘लाड़ली लक्ष्मी’ जैसी योजनाओं लालच देती है,तो वह उसे पढ़ाने के लिए भी तैयार हो जाते हैं और हम यह समझने लगते है कि परिवारों की मानसिकता बदल रही है।
दुर्भाग्य की बात है कि नारी सशक्तिकरण की बातें और योजनाएं केवल शहरों तक ही सिमटकर रह गई हैं। एक ओर बड़े शहरों और मेट्रो सिटी में रहने वाली महिलाएं शिक्षित,आर्थिक रुप से स्वतंत्र,नई सोच वाली,ऊंचे पदों पर काम करने वाली महिलाएं हैं,जो पुरुषों के अत्याचारों को किसी भी रूप में सहन नहीं करना चाहतीं,वहीं दूसरी तरफ गांवों में रहने वाली महिलाएं हैं जो ना तो अपने अधिकारों को जानती हैं और ना ही उन्हें अपनाती हैं। वे अत्याचारों और सामाजिक बंधनों की इतनी आदी हो चुकी हैं कि अब उन्हें वहां से निकलने में डर लगता है। वे उसी को अपनी नियति समझकर बैठ गई हैं।
हम खुद को आधुनिक कहने लगे हैं,लेकिन सच यह है कि आधुनिकीकरण सिर्फ हमारे पहनावे में आया है,विचारों से हमारा समाज आज भी पिछड़ा हुआ है। आज महिलाएं एक कुशल गृहिणी से लेकर एक सफल व्यावसायी की भूमिका बेहतर तरीके से निभा रही हैं। नई पीढ़ी की महिलाएं तो स्वयं को पुरुषों से बेहतर साबित करने का एक भी मौका गंवाना नहीं चाहती,लेकिन गांव और शहर की इस दूरी को मिटाना जरूरी है।
“महिलायें ही दें हर महिला को सम्मान,
तो बना रहेगा सबका स्वाभिमान,
महिला दिवस पर अपनी सहेलियों को दें ये उपहार,
तो ताउम्र बना रहेगा प्यार।”
समुद्र के गर्भ में छिपे सीप की कोख में पलते मोती की नैसर्गिक चमक,बंद कोपलों में खिलते फूल का मादक यौवन या फिर तपती धरती पर नीले नभ से गिरी बारिश की पहली बूँद की शीतलता…ये सभी सृजन के रूप हैं। प्रकृति ने यही वरदान स्त्री को भी दिया है। उसकी कोख से जन्मी बेटियाँ ही इस वरदान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। महिला दिवस पर हम सब महिलायें आज संकल्प करें कि, कोई भी महिला निराश्रित,दुर्बल- सी असहाय ना रहे,हम एक-दूसरे की मदद कर अपने सशक्त होने का परिचय दें,तभी महिला दिवस मनाया जाना सार्थक होगा।

परिचय-डॉ.रीता जैन लेखन में उपनाम रीता लिखती हैं। ३१ जनवरी १९६६ को उज्जैन में जन्मीं हैं और वर्तमान में इंदौर में निवासरत हैं। मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से संबंध रखने वाली डॉ. जैन की शिक्षा-एम.फिल.(लेज़र), पीएचडी(प्राणीशास्त्र-प्रबंधन) तथा एमबीए(मानव संसाधन विकास )है। आप कार्यक्षेत्र में प्राचार्य(निजी महाविद्यालय,इंदौर)हैं। सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत आप कई संगठनों से जुड़ीं हुई हैं। इनकी लेखन विधा-गीत एवं लेखन है। कई विज्ञान पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख प्रकाशित हुए हैं तो आकाशवाणी इंदौर से विज्ञान वार्ता, कविता एवं परिचर्चा प्रसारण सहित सामाजिक पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित हुई हैं। रीता जी को २००९ में शिक्षा के क्षेत्र में इंदौर नायिका अवार्ड सम्मान,खेल के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा २ सितारा प्रावीण्य प्रमाण-पत्र सहित टेबल टेनिस में राज्य तक विजेता प्रमाण-पत्र,निर्मला पाठक अवार्ड और युगल गरबा प्रतियोगिता में प्रथम आने पर कलेक्टर द्वारा सम्मानित किया गया है। आप ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं। इनकी विशेष उपलब्धि-जन्तु जीवाश्म पर शोध कार्य है,जिससे प्रभावित होकर लंदन के जीवाश्म विज्ञानी डॉ.एंड्रू स्मिथ ने निवास पर आकर काम को बहुत सराहा है। निवास पर ही जीवाश्म संग्रहालय भी बनाया है,जिसे देखने-अध्ययन करने सभी विद्यार्थी(निःशुल्क) आते हैं। लेखनी का उद्देश्य-एक ऐसा माध्यम है जिससे हम अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं,और प्रेरित भी होते हैं। इनके लिए प्रेरणा पुंज डॉ.पूर्णिमा मंडलोई हैं। विशेषज्ञता-विज्ञान एवं प्रबंधन में है,तो रुचि-लेखन,संगीत,पढ़ना तथा भ्रमण में है।