बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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सबका संसार ‘माँ’ (‘मातृ दिवस’ विशेष)…
माँ का मतलब,
सिर्फ़ रसोई में खड़ी
चूल्हे की आँच पर
रोटियाँ सेंकती हुई स्त्री नहीं होता,
न ही-
वह केवल
त्योहारों पर चरण छू लेने भर की
एक पवित्र तस्वीर है।
माँ,
दरअसल वह अदृश्य संसार है
जिसके भीतर,
पूरे परिवार की धड़कनें पलती हैं…
जिस दिन
घर के सब लोग सो जाते हैं,
उस दिन भी
माँ पूरी तरह नहीं सोती,
उसकी नींद के भीतर
बच्चों की खाँसी चलती रहती है,
पति की चिन्ताएँ जागती रहती हैं।
राशन का हिसाब,
बिजली का बिल
बेटी की शादी,
बेटे की फीस
और बूढ़े पिता की दवाइयाँ,
उसके सपनों में
धीरे-धीरे करवट बदलती रहती हैं…।
माँ का शरीर,
धीरे-धीरे घर में बदल जाता है
उसकी हथेलियों में,
हल्दी और आटे की गन्ध बस जाती है।
एड़ियों में,
अनगिनत यात्राओं की दरारें उग आती हैं
चेहरे पर,
वर्षों की चिन्ता की महीन रेखाएँ
और आँखों में,
एक ऐसा समुद्र
जो कभी पूरी तरह सूखता नहीं…।
वह सबसे आख़िर में खाती है,
सबसे पहले जागती है
सबके दुःख सुनती है,
पर अपना दुःख
अक्सर पानी के साथ निगल जाती है…।
माँ के पास,
कोई अवकाश नहीं होता
बीमार होने पर भी,
वह रसोई तक चली आती है
बुख़ार में भी,
बच्चों के माथे पर हाथ रखती है
और थकान के सबसे अँधेरे क्षणों में भी-
कह देती है
“मैं ठीक हूँ…।”
धीरे-धीरे,
उसकी इच्छाएँ
पुराने संदूक में रखे कपड़ों की तरह,
तह होकर रह जाती हैं
कभी जो लड़की,
बारिश में भीगना चाहती थी
अब छत से टपकते पानी के नीचे
बाल्टी रखती है।
कभी जिसे,
गीत गुनगुनाना अच्छा लगता था
अब वही,
बर्तनों की आवाज़ में
अपनी चुप्पी छुपा लेती है…।
फिर भी,
घर में सबसे अधिक जीवन
उसी के भीतर बचा रहता है
वही
बच्चों की हार में साहस बनती है,
पति की असफलता में धैर्य
बूढ़े माता-पिता की सेवा में करुणा,
और टूटते हुए घर की
अंतिम दीवार…।
माँ,
कभी इतिहास में दर्ज नहीं होती
उसके हिस्से,
न कोई पुरस्कार आते हैं,
न सम्मान समारोह
उसके हिस्से आता है,
बस निरंतर देना।
अपना समय,
अपनी नींद
अपनी इच्छाएँ,
अपनी जवानी
और अन्ततः,
अपना सम्पूर्ण जीवन…।
फिर एक दिन,
जब बच्चे बड़े हो जाते हैं
घर आधुनिक हो जाता है,
कमरों में मशीनें आ जाती हैं,
तब भी,
माँ की पुरानी आवाज़
घर की दीवारों में बनी रहती है…।
रसोई में रखा मसालों का डिब्बा,
उसकी उँगलियों को याद करता है
पुराना तकिया,
उसकी थकान को
और आँगन,
उसकी प्रतीक्षा को…।
माँ,
सिर्फ़ एक सम्बोधन नहीं
वह, वह जगह है
जहाँ लौटकर,
हर टूटा हुआ मनुष्य-
फिर से मनुष्य बनता है॥