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मानवता को लेकर चले राजनीति

रत्ना बापुली
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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विश्वास: मानवता, धर्म और राजनीति…

पृथ्वी के उद्भव से लेकर आज तक धर्म व राजनीति का छत्तीस का आँकड़ा रहा है, जिस न्यूट्रान, प्रोटान एवं इलेक्ट्रान के समाहित रूप से सम्पूर्ण विश्वमंडल की रचना हुई, वही मानव एवं सृष्टि का विध्वंसकारी कारक भी रहा।
इतिहास साक्षी है कि, राजनीति ने अपनी शक्ति को संवर्धित करने के लिए कई विध्वंसकारी खेल खेले हैं, इसलिए पूरी की पूरी सभ्यता नष्ट हो गई है इन्हीं राजनीतिक कुटिल चालों से।
प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध इसका जीता-जागता उदाहरण है। ऐसी परिस्थिति में हम कैसे कहें कि, राजनीति धर्म है! हमारे धर्म में यदि ४ वेद जीवन जीने का पाठ पढ़ाते हैं तो साम-दाम-दण्ड- भेद ये चारों राजनीति के सशक्त वेद हैं। बिना इसके राजनीति की कल्पना करना व्यर्थ है।
हमारा धर्म भी अनेक अपभ्रन्शों का केन्द्र रहा है, वास्तव में धर्म की सही व्याख्या आज तक हो ही नहीं पाई है। पूजा-पाठ, रीति- रिवाज को हम धर्म का जामा पहनाने लगे हैं, जिस कारण आपस में वैमनस्यता के सिवा और कुछ पनप नहीं पाया है।
अपने-अपने स्वार्थ के हित सबने ‘धर्म’ कहो, या ‘रीति- रिवाज’ सबको अपनाया है और धर्म का जो मूलभूत सिद्धान्त है ‘मानव का मानव से प्रेम’, उसे झुठला दिया है। मानव आज अपनी माटी, देश, जीवनदायिनी प्रकृति के साथ भी खिलवाड़ कर रहा है, करता आ रहा है।
कई सभ्यताओं का उदय होना और पुनः नष्ट हो जाना क्या इस बात का साक्षी नहीं है कि, राजनीति ने धर्म को आधार बनाकर केवल अपना उल्लू सीधा किया है।
यदि उदय सत्य है, तो अंत भी सत्य है और जब तक यह उदय-अस्त का खेल चलता रहेगा, राजनीति धर्म पर हावी होती रहेगी।
अतः, राजनीति को धर्म के परिवेश में देखना वैसा ही है, जैसे धरती व आकाश का मिलन होना। विशालता के अंह ने दोनों को न कभी मिलने दिया है, न देगा, पर दोनों एक-दूसरे के पूरक भी हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। यह पति-पत्नी का ऐसा रिश्ता है, जो न छोड़ते बनता है, न तोड़ते बनता है। राजनीति का शहंशाह जिस रास्ते से आता है, धर्म दूसरे गलियारे से गायब हो जाता है, क्योंकि विश्वास का परचम आजकल कहीं लहराता हुआ नहीं मिलता। राम राज्य एवं स्वर्ण युग की लोग भले ही कल्पना करें, पर वह संभव नहीं है। जब तक राजनीति अपने शहंशाह की कुर्सी से उतर कर आम जनता तक नहीं पहुँचती है, ऐसा होना कठिन है।
यह तो राजनीति का एक पक्ष हुआ, इसका उज्वल पक्ष भी है, जिसे हम नज़रअंदाज नहीं कर सकते। राष्ट्र-देश, समाज की उपलब्धि इन्हीं राजनीतिक कारणों से है। राम मंदिर निर्माण एवं सनातन धर्म को सबके मन में बिठाना यह राजनीति का ही प्रयत्न रहा है, इसलिए कहा जा सकता है कि, राजनीति धर्म नहीं, मानवता को लेकर चले तो राम-राज्य आने में देर नहीं लगेगी।
चलिए, इसी सुन्दर कल्पना के साथ कि, आने वाला कल राजनीति, विश्वास व मानवता के धर्म के साथ चलकर हमारा सपना पूरा करेगा। मन में इस विश्वास का सूर्य जलाए रखते हैं कि, यह मत पूछो कल क्या होगा, पर जो भी होगा, अच्छा होगा।
जय हिन्द, जय भारत।