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मासूम का करुण क्रंदन

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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यूक्रेन और रूस के बीच छिड़े युद्ध में राजधानी कीव में फंसी जूही अपने ३ महीने के बच्चे को अपनी छाती से चिपकाए हुए बैठी हुई थी। गरजती-बरसती मिसाइल और बम के धमाकों की आवाजों से वहाँ बैठे सभी लोगों के चेहरे पर भय और खौफ का आतंक छाया हुआ था। तभी धमाके की जोरदार आवाज से पूरी बिल्डिंग कुछ मिनटों तक कांपती रही, साथ ही पूरा  आकाश सफेद रोशनी से नहा उठा। यह सब देख कर डरी हुई जूही ने पति आयुष की हथेलियों को कस कर पकड़ लिया था, लेकिन उसकी निगाहें उक्रेनी पिता की गोद में बिलखते दुधमुँहे बच्चे पर बार-बार जाकर अटक जाती थी। वह २-३ महीने का बच्चा निरंतर चीख-चीख कर रो रहा था। उसकी घायल माँ अस्पताल में अपनी साँसों के लिए संघर्ष कर रही थी ।
        उस मासूम के करुण क्रंदन ने उसके दिल में हाहाकार मचा रखा था। उसका दिल करुणा से विगलित हो रहा था। काफी देर से ‘हाँ’ और ‘नहीं’ के आरोह-अवरोह के झूले में झूलती हुई वह उस क्रंदन को अनसुना करने का प्रयास कर रही थी।
    अंततः, वह अपने को नहीं रोक सकी और रोती-बिलखती बच्ची को उसके पिता से लेकर अपनी छाती से लगा लिया। प्यार से उसके माथे को चूम लिया। अमृत पान करती मासूम की नन्हीं अंगुलियों का स्पर्श पाकर उसके चेहरे पर मुस्कान छा गई। दुग्धपान के साथ उसकी घुट-घुट की आवाज ने जूही के मन में मानों सात स्वरों की सरग़म-सी छेड़ दी थी। वह सोच रही थी, कि सच ही कहा है-भाव संप्रेषण के लिए शब्द आवश्यक नहीं हैं।
एक-दूसरे की भाषा से अनजान उक्रेनी पिता ने बतौर धन्यवाद जूही के दोनों हाथों को अपनी हथेलियों में पकड़ कर अपने सिर को झुका लिया।