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मेरी दीदी

संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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बहुत तेज थी मेरी दीदी,
खूब खिलाती, खूब पढ़ाती
माँ जैसा ही रौब जमाती,
बड़ा हँसाती, बड़ा बताती
पूरा इंसाक्लोपीडिया समझाती,
कथा-कहानी, अर्थ बुझाती।

कवि-लेखक का नाम बताती,
लेखक काव्य के कौन बताती
पूरे नाम खुद भी रट जाती,
डांट-डपट के हमें रटाती
मास्टरनी वो खुद बन जाती,
हम छोटों को खूब डराती।

अंक गणित व बीज गणित के,
सारे फार्मूले रटती, हमें रटाती
सारे विषयों को खूब पढ़ाती,
भूगोल, इतिहास, विज्ञान सहित
समाज अध्ययन भी उन्हें थी आती,
अपनी कक्षा में सर्वाधिक अंक पाती।

स्कूल-कॉलेज की टॉपर कहलाती,
मेरे कम नम्बर पर हमें चिढ़ाती
सुबह से शाम वो खूब समझाती,
समझाते वो खुद थक जाती
फिर पढ़ती और साथ पढ़ाती,
हिन्दी-अंग्रेजी पुस्तक पाठ कराती।

पढ़ने के वो गुर भी बताती,
धारा प्रवाह में पठन कराती
थोड़ी गलती पर, फिर से पूरा पाठ कराती,
ज्यादा गलती हो जाए तो, कड़े हाथ से चाँटा लगाती
स्कूल ड्रेस भी खुद पहनाती,
माँ से बढ़कर प्यार जताती।

हर गलती पर वो गुस्साती,
लेख, कविता खुद वो लिखती
दोहे-कविता का भाव बताती,
प्रतियोगिता में खुद भी बैठती,
हमें भी प्रतियोगिता भाव जगाती,
उन्हें दुनिया की हर विधा थी आती।

हममें ज्ञान विधा थी आधी,
शिक्षा में वो अव्वल कहलाती
कुछ दिन में कॉलेज की प्रोफेसर बनती,
फिर से अंतिम पाठ पढ़ाती
अच्छा करो तुम भाई बनकर,
प्रतिष्ठा मेरी बहुत बढ़ाती।

मैं भी दबाव में मेहनत करता,
खूब रटता तब नम्बर बढ़ता
मेरी दीदी माँ सी ममता,
जिनसे सीखा घुटने चलना
जिनकी गोदी थी मेरा पालना,
मैंने दीदी से सीखा दुनिया में कैसे है चलना।

समर्पित मेरे शब्द-पंक्तियाँ,
जिनसे सीखे शब्द व पंक्तियाँ गढ़ना
दीदी सरस्वती ज्ञान की देवी,
सीखा है उनसे ऊँचे चढ़ना।
दीदी से तुम सब भी पढ़ना,
वही सिखाती आगे बढ़ना॥

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