ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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एक चिट्ठी अब, मेरी माँ के नाम,
जो करती रहती, घर के पूरे काम।
सुबह से लेकर, रात तक लगातार,
फिर करती है, मेरी माँ तब आराम।
माँ से आती है, ममता की खुशबू,
मेरी माँ बस, तू ही तू होती हर सू।
तेरे आँचल में है, अपना बसेरा,
तेरे सिवा नहीं है, कोई अब मेरा।
दुनिया को देखा, तेरी ही नजर से,
मुझको तू बचाती, हर बुरी नजर से।
जो मैं जाती हूँ, जब भी घर से बाहर,
जब तक न लौटे, नहीं तुझको राहत।
हर थोड़ी देर में, तू करती है फोन,
कब तक तू आएगी, बोल क्यों है मौन ?
अगर मैं पड़ जाती, हूँ जब भी बीमार,
ख्याल तू रखती है, हर घड़ी दो-चार।
तेरे सिवा नहीं समझा, है कोई मुझको,
बैठ मेरे साथ सब, बता दूं मैं तुझको।
अब चिट्ठी लिखना बंद, करती हूँ
हूँ मेरी माँ,
हुई मेरी गलती को, माफ करना प्यारी माँ।
अंत में मैं तुझको, करती हूँ सादर प्रणाम,
अब पूरे करने हैं, बाकी के और सब काम॥