Visitors Views 42

मैं नारी

डॉ.नीलम कौर
उदयपुर (राजस्थान)
***************************************************

भोर की प्रथम किरण का

कर स्पर्श,

चलती रहती हूँ मैं।

किरणों के बढ़ते कद तक,

ढलते-ढलते किरण-पाख

सिमट जाती तब

चलती हूँ मैं।

चंद्रकिरण के संग,

मध्य रात्रि तक आते-आते

जब चाँद भी लगता सिमटने,

समेट कर अपने पाँव

पेट में अपने ही,

मैं भी थम जाती हूँ।

कुछ पल,

नहीं रहती मैं

संगमरमरी अट्टालिकाओं में,

या स्वर्ण के झरोखों में

मैं तो कुदरत की

छनती धूप के छाजन तले,

मिट्टी की चादर पर

बस कुछ पल ठहर

जाती हूँ,

फिर निकल जाती हूँ।

पेट की आग

अपनी नहीं परिवार की

(जो पुरुष कर्त्तव्य है)

मिटाने,

सर पर छबड़ी रख भरी दुपहरी सब्जी बेचने,

कमर में पल्ला खोस  घर-घर

बासन मांजने।

बनते महलों के लिए

तोड़ती पत्थर,

कोयला-कचरा बीनने

फैक्टरियों में ताना-बाना

बुनने या बदले परिवेश में,

किसी भी फर्म का

गणवेश पहने

मुस्तैद,चुस्ती प्रदर्शन करने,

थोड़ा-सा परिवर्तन

ये कि अध्यापिका का

पहन आवरण,

निकलती हूँ।

इंतहा मेरे नारीत्व की,

अबला,कोमला,निर्बला

समझी जाती हूँ।

गंगा-सी पवित्र-पाक,

कहला कर नर की गंदगी

सहती हूँ।

अन्नपूर्णा का पावन दर्जा,

यूँ ही नहीं देता मानव

खलिहानों में

खून-पसीना करती हूँ।

हाँ,अपवाद भी हैं हममें,

जैसे माँ काली दुर्गा-

सी अवतारी

या ब्रह्माणी-सी निर्मात्री,

आदि शक्ति प्रतिरुपा

आकाश-पाताल,

एक करने वाली

पर…

नारी ही हूँ ना।

नर की हवस का शिकार,

भरी सभा से निकल

भरे बाजार,

चीर हरण करते

दुशासन,खम ठोंकते कर्ण

पैशाचिक अट्टहास करते

दुर्योधन के

सम्मुख पाँच रक्षकों की

निरीह विवशता,

और अनुभवों को

मौन मूक विवश

होते देखती हूँ।

भोर की पहली किरण से,

ताराभर रजनी…॥

परिचय – डॉ.नीलम कौर राजस्थान राज्य के उदयपुर में रहती हैं। ७ दिसम्बर १९५८ आपकी जन्म तारीख तथा जन्म स्थान उदयपुर (राजस्थान)ही है। आपका उपनाम ‘नील’ है। हिन्दी में आपने पी-एच.डी. करके अजमेर शिक्षा विभाग को कार्यक्षेत्र बना रखा है। आपका निवास स्थल अजमेर स्थित जौंस गंज है।  सामाजिक रुप से भा.वि.परिषद में सक्रिय और अध्यक्ष पद का दायित्व भार निभा रही हैं। अन्य सामाजिक संस्थाओं में भी जुड़ाव व सदस्यता है। आपकी विधा-अतुकांत कविता,अकविता,आशुकाव्य और उन्मुक्त आदि है। आपके अनुसार जब मन के भाव अक्षरों के मोती बन जाते हैं,तब शब्द-शब्द बना धड़कनों की डोर में पिरोना और भावनाओं के ज्वार को शब्दों में प्रवाह करना ही लिखने क उद्देश्य है।