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ये कैसा जह़र घुला

एल.सी.जैदिया ‘जैदि’
बीकानेर (राजस्थान)
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दिल रोता है आँसू मगर निकलता नहीं,
कतरा,कतरा बहता है लहू दिखता नहीं।

गम-ऐ-हाल कैसे जीते हैं लोग यहां पर,
मरना चाहे अगर चैन से कोई मरता नहीं।

चलती है साँसें रुह से उतर कर रुह तक,
जिन्दा तो है मगर जिन्दा वो दिखता नहीं।

कहने को तो अल्फाज़ लबों पर बहुत है,
खौफ इतना है कि मगर कोई कहता नहीं।

शहर-ऐ-फिजाओं मे ये कैसा जह़र घुला,
कि गुल-ऐ-बहार में भी गुल खिलता नहीं।

शोजे-गम-ऐ-जुनून बहुत जीता है ‘जैदि’,
संगो-खार राहों में है,फिर भी डरता नहीं॥

(इक दृष्टि इधर भी:गम-ऐ-हाल=गम के हाल में,शहर-ऐ-फिजाओं= शहर के वातावरण,गुल-ऐ-बहार=गुल के बहार, शोजे-गम-ऐ-जुनून=आन्तरिक दु:ख की पीड़ा, संगो-खार=पत्थर और कांटे।)

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