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राखी

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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अपने घर से मेरे घर तक,
पैदल ही तो तुम चली आती थी
फुर्सत कहां थी तुम्हारे किसानी जीवन में,
वह तो खींच के, राखी तुम्हें यहां लाती थी।

आज कहां हो तुम बहना ?
देख, कलाई मेरी सुनी है
मैं पूछ रहा हूँ विधि से बार-बार,
तूने जिंदगी देकर, मौत काहे को चुनी है ?

रो रहा हूँ भीतर ही भीतर,
पड़ोस में, बहनें सबकी आई है
उनके घरों में खुशियाँ हैं आज तो,
बहनें जो राखी लाई है।

चीर डालो आज अम्बर का सीना,
सूरज की किरणों पर बैठकर तुम आओ।
छोटा हूँ मैं तुम्हारा बहना,
चाँद-सितारे आज तुम मुझे पहनाओ।

निष्पाप प्रेम का बंधन यह बहना,
लोगों को, रेशम का जो धागा है
क्या जाने ये कीमत राखी की बहना ?
इनकी जिंदगी से, शायद कोई अपना ऐसा न भागा है ?

अभी उम्र ही क्या थी बयालीस की,
क्यों छोड़ के तुम हमें चली गई ?
पहले, भैया छोड़ कर चले गए, अब तुम,
हमारी तो जिंदगी ही जैसे छली गई।

जहां भी होंगे तुम, ओ बहना-भैया!
महफूज रहे तुम,सदा खुश रहना।
वहीं मनाना त्योहार राखी का तुम,
ओ सूरज-चंदा! तुम उनसे यह कहना॥

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