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राजनीति का धर्म या धर्म की राजनीति

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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धर्म का कार्य है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना और राजनीति का उद्देश्य है लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उनके हित में काम करनाl जब धर्म और राजनीति साथ-साथ नहीं चलते,तब हमें भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और कपटी धार्मिक नेता मिलते हैंl एक धार्मिक व्यक्ति,जो सदाचारी और स्नेही है,अवश्य ही जनता के हित का ध्यान रखेगा और एक सच्चा राजनीतिज्ञ बनेगाl एक सच्चा राजनीतिज्ञ केवल सदाचारी और स्नेही ही हो सकता है,इसीलिए उसे धार्मिक होना ही है,परन्तु राजनीतिज्ञ को इतना भी धार्मिक न होना है जो दूसरे धर्मों की स्वतन्त्रता और उनकी विधियों पर बंदिश लगाये। राजनीति और धर्म दोनों ही हर वर्ग के जीवन को प्रभावित करने वाले विषय हैं,जो कभी भी एक-दूजे से अलग नहीं हो सकते,मगर राजनीति की दशा और दिशा के बारे में सोच बदलने की आवश्यकता है।
इस समय धर्म की राजनीति को लेकर तमाम सवाल,आरोप-प्रत्यारोप उठ रहे हैंl एक राजनीतिज्ञ को धर्मिक होना ज़रूरी है,धर्म के बिना समर्थ और सार्थक राजनीति नहीं हो सकतीl हमारे राजनीतिज्ञों को राजनीति के धर्म का पालन करना होगा,ऐसा न हो कि धर्म की राजनीती की जाये। भारतीय राजनीति के इतिहास में देश की आज़ादी के बाद से अब तक जिस तरह से देश में राजनेताओं ने राजनीति की है,वह सोचनीय हैl राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी होने के नाते जो कुछ पढ़ा या समझा,उससे इस नतीजे पर पहुंचा कि आज भारतीय राजनेता जो सत्ता पर आसीन हैं या फिर विपक्ष में हैं,वे राजनीति का धर्म एवं सिद्धान्तों को भुलाकर धर्म की राजनीति कर सत्ता पर कब्ज़ा जमाये हुए हैंl क्या वह राजनीति के धर्म का हक अदा कर रहे हैं ?. भारत देश जिसने पूरी दुनिया को पाठ पढ़ाया हो,जिसने विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार किया हो,वह भारत देश जो कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था,जहाँ की गंगा-जमुनी तहज़ीब की दुहाई दी जाती थी,जहाँ विश्व् भर में सब से ज़्यादा भाषाएँ और धर्म में आस्था रखने वाले लोग रहते हों ,जहाँ की एकता और अखण्डता इतिहास रचती हो,जहाँ की सभ्यता को दूसरे देशों में मिसाल बताया जाता हो,वहाँ ये हालात हैंl दरअसल भारत में राजनेताओं ने राजनीति का धर्म भुला कर अपनी ज़िम्मेदारी के क़र्ज़ को अपने से अलग कर दिया है।
क्यों किसी को हिंदुत्व खतरे में लगता है ? और धर्म की राजनीति करके देश,राज्य की सत्ता को हथिया कर मुखिया के रूप में आसीन होना चाहते हैं। देश का कोई भी नागरिक चाहे वह किसी भी समुदाय से हो,किसी धर्म में आस्था रखता हो उसको देश में किसी भी तरह का दंगा-फसाद,खून-खराबा स्वीकार नहीं होगा,जहाँ केवल और केवल मानवता और मासूम की जान जाती हो। क्या हम और आपने कभी इस बारे में सोचा है कि हमारी भावना संवेदना क्यों उन राजनेताओं के हाथों में है,जो कभी भी देश में शांति नहीं चाहते। क्यों किसी को हिंदुत्व खतरे में लगता है किसी को इस्लाम किसी को ईसाईयत खतरे में लगती है।
इन सारी बातों,इन सारे धर्मों से ऊपर जो मानवता का धर्म है,उसकी फ़िक्र किसी को भी नहीं है। कहीं धर्म तो कहीं नस्लवाद की लड़ाई जारी हैl भारत में धर्म और नस्लवाद की लड़ाई को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकताl देश की जनता की आँखें तरस गयी इस बात के लिए कि जिस नेता को अपना बहुमूल्य मत देकर सत्ता तक पहुंचाया, कभी वो जनता से किये गए वादों को पूरा करने हेतु सरकार से लड़ाई करता,कभी वो अपने क्षेत्र की जनता के लिए सस्ती शिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य,बिजली,पानी जीवन सुरक्षा के मसले हल न होने के कारण अनशन करता।
आज देश के हर कोने में हर धर्म को लेकर बहस छिड़ी हुई हैl इस लड़ाई में आज तक अनगिनत जानें जा चुकी हैं और न जाने कितनी और जानें जाती रहेगीl आज हर कोई मानवता के लिए बड़ी-बड़ी बातें तो करता है,मगर कभी ईमानदारी से उसी मानवता की सेवा के लिए अपनी सोच बदलने की कोशिश की ? कभी नहीं,क्योंकि हमारी मानसिकता में व्यवहारवाद ही नहीं है। हम एक ऐसे माहौल में जीते हैं,जहां परम्पराओं को तोडक़र उससे आगे की सोचना हमारे आचरण में नहीं है,या अंधविश्वास की बंदिश से आज़ाद होना हमारे बस में नहींl यही कारण है कि हम अपने असली धर्म और उसकी परिभाषा को भूल गए हैं।
सिद्धान्तों के क्रियान्वयन के लिए मन-वचन और कर्म में एकाकार होना जरूरी है,पर आज हमारे वचन दोगले हो गए हैं कहते कुछ हैं और करते कुछ हैंl कुटिलता रग-रग में भरी है,जैसे जलेबी में शीरा भर जाता है,वैसा ही चरित्र राजनेताओं का हैl यह खतरनाक चरित्र हैl

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।