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वट वृक्ष ‘मित्रता’

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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ज़िंदगी का नाम दोस्ती… (मित्रता दिवस विशेष)…

मित्र वह वट-वृक्ष है, जो मित्रों को हर पल छाँव दे,
जब कभी आँसू बहें तो वह दुआ बनकर आए
जब मनुष्य अधीर हो, वह दृढ़ता का परिचय दे,
हर कठिन राह में सच्चा मित्र हौसला बन जाए।

इसके लिए न कोई एहसास, न कोई एहसान लगे,
सिर्फ दोस्ती साथ, प्रेम से कंधा मिलाकर रहे
हर क्षण निःस्वार्थ भाव से मन एक-दूजे से जुड़े,
अपने प्राणों को भी निछावर करने में संकोच न करे।

मित्र कभी-कभी हँसाते, हँसाते रुला दें,
और रोते हुए मन को फिर हँसा दें
पास में दोस्त रहे तो पता ही नहीं चलता,
हँसते-हँसते कब जीवन के पल बीत जाएँ।

एक मित्र का घर जल गया, रो-रो कर सबको बता रहा था,
उसका मित्र आया, पूछा—”क्या हुआ ?”
उसने कहा, “सब जल गया।”
मित्र बोला—”कुछ नहीं जला, तुम सही-सलामत हो,” कहकर गले लगा लिया।

मित्र नहीं वह, जो केवल रोते को हँसा दे,
मित्र तो वह है जो हर पीड़ा को अपना बना ले
जब मित्र का साथ हो, चाँदनी रात हो, बातें साथ हों,
मंद-मंद हवा गुनगुनाए, दिल को सुकून मिले।

चाय की चुस्की हो, चुहल-बाज़ी हो, प्रेम की बात हो,
हर मिलन में अपनापन और विश्वास की सौगात हो
मन अपने-आप प्रफुल्लित हो जाए,
हर पल जीवन में मित्रता का मधुर एहसास हो।

मित्र वही, जो हर दुःख-सुख में साथ दे,
मन की भाषा को बिना कहे ही पहचान ले
मित्रता वह झरना है जो हर पल प्रेम बहाता रहे,
जीवन की हर राह को स्नेह से सजाता रहे।

आप भी भीगें और दोस्त को भी भिगाएँ,
प्रेम की वर्षा में सबको साथ ले आएँ।
हर भाव एक-दूसरे का मुस्कराकर अनुभव करें,
यही सच्ची मित्रता है, इसे जीवन भर अपनाएँ॥