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विकास और सिसकते पहाड़, चेतना होगा

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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भारत के पर्वतीय राज्यों जैसे- उत्तराखंड, हिमांचल प्रदेश, झारखंड, अरुणांचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, अरावली क्षेत्र (राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली) छत्तीसगढ़ के पठारी क्षेत्र, उड़ीसा के पूर्वी घाटी तथा दक्षिण भारत के पश्चिमीघाट के क्षेत्र आज जिस भू-स्खलन, दरकती पहाड़ियाँ, बाढ़, मिट्टी के कटाव, नदी तल के खिसकने और प्राकृतिक असंतुलन से जूझ रहे हैं, उसका प्रमुख कारण पिछले ३-४ दशकों से बढ़ता वन का कटाव, अनियंत्रित निर्माण कार्य, पर्यावरणीय अनुमति के बिना विकास परियोजनाओं की मंजूरी, सड़कों का अत्यधिक विस्तार, सुरंग निर्माण, होटल और टाउनशिप एवं विकास के नाम पर पहाड़ों की अधाधुंध खुदाई और वृक्षों की  बेतहाशा कटाई है।
दरअसल, समय के साथ साथ पहाड़ के लोगों ने अब अपनी पुरानी परंपरा को भुला दिया है। वह भी विकास की दौड़ में शामिल होकर आगे बढ़ने के लिए प्रयास कर रहे हैं।
   उत्तराखंड जब से नया राज्य बना है, उसके बाद ही यहाँ सड़कों की जरूरत महसूस की गई। गाँवों को सड़कों से जोड़ा गया। आज अधिकांश गाँव सड़क से जुड़ गए हैं, परंतु परिणाम क्या हुआ।
सड़कों का गाँवों से जुड़ जाना ही अब गाँवों के लिए आफत बन गया है। सड़क बनाने के लिए जगह- जगह पहाड़ काटे गए। पहाड़ काटने के लिए विस्फोट किए गए।   उत्तराखंड हिमालय क्षेत्र में आता है, और हिमालय की पहाड़ियाँ अभी अपनी शैशवावस्था में हैं। इसी कारण खुदाई और विस्फोट से खोखले हुए पहाड़ बादल फटने या बारिश होने पर भरभरा कर गिरने लगते हैं तथा नीचे के गाँवों को मलबे से पाट देते हैं।
राज्य के पुराने अधिकतर गाँव पहाड़ों की चोटियों पर मिला करते हैं। पहले गाँवों को बसाते हुए जमीन की मजबूती देखी जाती थी। आज गाँव सड़कों के किनारे बस रहे हैं। सड़कें सारी तलहटी में हैं। घर बनाने से पहले कोई यह जानने की कोशिश नहीं करता, कि यह जमीन कहीं आसपास बहने वाली नदी की तो नहीं है।
उत्तराखंड आपदा में अधिकतर संख्या में वह घर बहे, जो नदी की जमीन का अतिक्रमण करके बने थे। नदी ने आपदा के समय अपनी जमीन पर दावा किया और उसे वापस ले लिया।
पहाड़ों का सीना छलनी कर किए गए विकास कार्य आज मनुष्य पर ही भारी पड़ने लगे हैं। दरकते पहाड़ विकास के नाम पर अब विनाश लीला करते दिखाई पड़ रहे हैं। इस वजह से ज़िंदगी तबाह हो रही है। जब-जब मनुष्य ने अपनी हदें पार की हैं, प्रकृति ने उसे उसके बौनेपन का एहसास करा दिया है, परंतु मनुष्य आज भी अनजान बना बैठा है।
   विद्युत परियोजनाओं के नाम पर विस्फोट, सुरंग और खनन ने पहाड़ों को खोखला कर दिया है, तो रही- सही कसर बेतरतीब निर्माण ने पूरी कर दी है। देश को पालने वाली अधिकतर नदियों का उद्गम हिमालय से ही होता है। जहाँ विकास के नाम पर छोटे-बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट लगाए गए, जो नियम कानून को ताक पर रख कर पहाड़ों का दोहन कर रहे हैं। इससे हिमखंड (ग्लेशियर) पिघल रहे हैं और बारिश के साथ पत्थरों की भी बारिश हो रही है। अकेले किन्नौर में सतुलज नदी के बेसिन पर ही २२ बिजली परियोजनाओं का निर्माण किया गया है।
  इस वर्ष आई आपदा के कारण हजारों लोग बेघर हो गए और शरणार्थियों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस तबाही ने मौजूदा विकास के मॉडल पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। पहाड़ों की क्षमता का अंदाज लगाए बिना यहाँ दशकों से विकास गाथा लिखने की जिद बनी रही। बिजली परियोजनाओं के लिए पहाड़ों का सीना चीर कर सुरंगें खोदी गईं, तो अनियोजित सड़क निर्माण और खनन आदि ने धरती को हिला कर रख दिया है। नदियों- नालों को रोक कर अवैज्ञानिक निर्माण ने उन्हें रास्ता बदलने को मजबूर कर दिया। रही-सही कसर बादल फटने और मूसलाधार बारिश ने पूरी कर दी है। बिना किसी अध्ययन के कि कौन-सा क्षेत्र किस तरह का है, बेतरतीब निर्माण कार्य और खनन ने इस तबाही की पृष्ठभूमि रची है।
शिमला ही नहीं, प्रदेश के कई शहरों में क्षमता से ज्यादा आबादी है और बसावट भी; १७५ साल पहले जब अँग्रेजों ने शिमला बसाया तो यहाँ २५ हजार से ज्यादा लोगों को नहीं बसाने की योजना थी। वर्तमान में शिमला की आबादी ढाई लाख को पार कर चुकी है।
चतुर्भुज सड़क और बिजली परियोजना के लिए जिस तरह से पहाड़ों को छलनी किया गया, वह वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से सही नहीं है। नदियों के किनारे १०० मीटर तक निर्माण कार्य नहीं हो सकता,पर इस नियम को भी ताक पर रख कर निर्माण कार्य होते रहे हैं। सरकार की भी आँखें बंद रहीं। जब नदियों ने अपना रौद्र रूप दिखाया, तो किनारे की बस्तियाँ बह गईं ।
तबाही के कारण में पहाड़ों की सीधी कटाई है, जबकि फोरलेन के लिए वर्टिकल कटिंग होती है। यही फोरलेन किनारे तबाही का कारण है। वर्टिकल कटिंग के लिए पर्याप्त जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाता एवं पैसा बचाने के लिए अंधाधुंध कटाव जारी है ।
अवैज्ञानिक और अंधाधुध यानी बेतरतीब निर्माण कार्य की वजह से शहर कांक्रीट के जंगल बन गए हैं। पहाड़ों को काट कर बहुमंजिला भवन खड़े हो गए हैं। शहरों में क्षमता से अधिक घर बनते जा रहे हैं। बिना किसी जांच के कच्ची मिट्टी पर निर्माण कार्य किया जा रहा है।  बड़ी कंपनियाँ अनुभवहीन ठेकेदारों  से कार्य करवा रही हैं। मलबा नदियों में फेंका जा रहा है। इस कारण नदियाँ राह बदलने को मजबूर हो रही हैं।
ऐसे ही कांक्रीट के जंगल तो बना लिए, परंतु ड्रेनेज व्यवस्था विकसित नहीं की गई, इसलिए ज्यादा बारिश के समय पानी को जहाँ से राह मिली, बहाव तेज हो गया और मकान ढह गए।
सबसे आवश्यक है, कि स्थान विशेष के अनुकूल वनस्पतियाँ और पेड़ के जंगल पनपाए जाएँ, ताकि पर्यावरण की रक्षा हो सके। पहाड़ी पर्यटन पर भी परिस्थिति के अनुसार नियंत्रण के साथ पर्यटकों पर भी नजर रखनी होगी।
साथ ही, राज्य और केंद्र सरकार को मिल कर भूगर्भीय जोखिम मूल्यांकन आधारित योजना बनानी चाहिए। नागरिक समाज, युवा, छात्र और स्थानीय पंचायत आदि इन प्रयासों में शामिल होते हैं, तो एक नया हरित पर्वतीय मॉडल सामने आ सकता है। यदि आज हमनें विनाश को नहीं रोका, तो न केवल पहाड़ दरकेंगें, वरन् मानव सभ्यता, संस्कृति और अस्तित्व भी इन दरकती चट्टानों के नीचे दब जाएगा।
इसलिए यह समय चेत जाने का है, कि विकास के नाम पर विनाश ना हो वरन् विज्ञान, संवेदनशीलता, और सतर्कता के साथ पर्वतीय राज्यों को सशक्त और सुरक्षित बनाया जाए। 
यही २०४७ के जल और पारिस्थितिक आत्मनिर्भर भारत की नींव बनेगी। मुख्य बात यह है, कि अब समय बहुत कम है, जो भी करना है जल्दी करना होगा, वरना विलंब बहुत भारी पड़ सकता है।