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विरह

तारा प्रजापत ‘प्रीत’
रातानाड़ा(राजस्थान) 
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कैसे जाऊं
भरने गागर,
मन की
गगरी रीती है।

विरह अग्न में
विरहन को,
पल लगे
सदियां बीती है।

झर गये पत्ते
आशाओं के,
सूखा जीवन
पतझर-सा,
लगे है जैसे
विष विरह का
साँस-साँस में
पीती है।

याद में तेरी
गीली लकड़ी,
बन जैसे
सुलगती है,
न जलती
न बुझती है।

प्रेम में तेरे
‘प्रीत’ बेचारी,
मरती है…
न जीती है॥

परिचय-श्रीमती तारा प्रजापत का उपनाम ‘प्रीत’ है।आपका नाता राज्य राजस्थान के जोधपुर स्थित रातानाड़ा स्थित गायत्री विहार से है। जन्मतिथि १ जून १९५७ और जन्म स्थान-बीकानेर (राज.) ही है। स्नातक(बी.ए.) तक शिक्षित प्रीत का कार्यक्षेत्र-गृहस्थी है। कई पत्रिकाओं और दो पुस्तकों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं,तो अन्य माध्यमों में भी प्रसारित हैं। आपके लेखन का उद्देश्य पसंद का आम करना है। लेखन विधा में कविता,हाइकु,मुक्तक,ग़ज़ल रचती हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण होना है।