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व्यापक समाज में कविता की स्वीकार्यता लगभग नहीं के बराबर

पटना (बिहार)।

कविता की बारीकियों को समझने के लिए, ऑनलाइन या ऑफलाइन कविता की पाठशाला की सख्त जरूरत है। हमने इसी उद्देश्य से ऑनलाइन पाठशाला को चला रखा है। कई बार साहित्यकार इतनी अच्छी रचनाओं का सृजन कर लेता है कि, व्याकरण संबंधी दोष के बावजूद उसे संशोधित कर प्रकाशित करना अनिवार्य लगता है। दूसरी तरफ विद्वान साहित्यकार की कई रचनाएं ऐसी होती है कि, दोष नहीं रहने के बावजूद वह रचना प्रभावकारी नहीं होती। इसीलिए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वान साहित्यकार एक सफल सम्पादक भी थे और नए-पुराने रचनाकारों की वैसी रचनाओं को संशोधित कर प्रकाशित करते थे, जो रचनात्मक स्तर पर उच्च कोटि की होती थी। निष्पक्षता, निर्भीकता और श्रेष्ठ सम्पादन की यह पहली शर्त होती है। आज कवि बिरादरी तो सक्रिय है, लेकिन व्यापक समाज में कविता की स्वीकार्यता लगभग नहीं के बराबर है।
अवसर साहित्य पाठशाला के २२ वें अंक में साहित्यिक पाठशाला का ऑनलाइन आयोजन करने वाले संयोजक सिद्धेश्वर ने ऑनलाइन माध्यम से उपरोक्त उद्गार व्यक्त किए।
उन्होंने नए साहित्यकारों के संदर्भ में कहा क़ि जरूरी है कि, आज के साहित्यकार साहित्य को गंभीरता से लें।बड़ी-बड़ी गोष्ठी में जाने की अपेक्षा छोटी-छोटी में समय व्यय करें।
विजया कुमारी मौर्य ने कहा कि आजकल घर-घर कवि हैं, जो अपने अन्दर भाव उभरे और लिख डाला। ऐसे कवियों को मार्गदर्शन की आवश्यकता है। सुधा पांडे ने कहा कि, आलोचना से ही प्रखरता आती है। नमिता सिंह ने कहा कि, अच्छा रचनाकार बनने के लिए आलोचनाओं को सकारात्मकता से से लेना अत्यंत आवश्यक है। माधवी जैन ने कहा क़ि, छन्दमुक्त कविता में कथ्य के साथ लयात्मकता नहीं हो तो वह सपाट बयानी है, कविता नहीं। अखोरी चंद्रशेखर, हरि नारायण हरि, पंकज करण, पुष्प रंजन, इंदु उपाध्याय, डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना आदि ने भी चर्चा में भाग लिया।