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सनातन संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं ‘शिखा’ एवं ‘यज्ञोपवीत’

अमल श्रीवास्तव 
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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सनातन संस्कृति के २ महत्वपूर्ण प्रतीक माने जाते हैं, एक ‘यज्ञोपवीत’ और दूसरी ‘शिखा।’
वास्तव में सनातन संस्कृति के हर छोटे-बड़े प्रतीक या हर छोटी-बड़ी बातें अत्यन्त महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं, इन्हे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी परखा जा चुका है। सनातनी पद्धति में १६ संस्कार माने जाते हैं उनमें से यज्ञोपवीत अति महत्वूर्ण माना गया है। इस संस्कार में किशोर अवस्था प्रारंभ होते ही व्रतबंध कराया जाता है, इसमें कंधे में जनेऊ धारण करवाकर जीवन के महत्वपूर्ण दायित्व पूर्ण करने का व्रत दिलवाया जाता है। सनातन संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये ४ पुरुषार्थ माने जाते हैं। इन्हीं को प्राप्त करने हेतु ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास आश्रम की व्यवस्था बनाई गई है। इसी के अधार पर जीवन को सुचारू रूप से संचालन करने का व्रत धारण करवाया जाता है, इसी को यज्ञोपवीत संस्कार कहा जाता है।
शिखा का महत्व भी जनेऊ जैसा ही है।सनातन संस्कृति का छोटे से छोटा सिद्धांत, छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी है। छोटी-सी शिखा अर्थात् चोटी एवं जनेऊ अर्थात यज्ञोपवीत भी कल्याण, विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाते हैं। शिखा और जनेऊ का परित्याग करना मानो अपने कल्याण का परित्याग करना है। रहीम ने छोटे के महत्व को समझाते हुए कहा है कि,-
‘रहिमन देख बडे़न को,
लघु न दीजिए डार।
जहां काम आवे सुई,
कहा करे तरवार॥’
वास्तव में छोटी बातें भी समय और परिस्थिति के अनुसार अति महत्वपूर्ण होती हैं। ऐसे ही शिखा और जनेऊ न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती।
प्राचीन काल में किसी की शिखा काट देना मृत्युदण्ड के समान माना जाता था। इसी तरह जनेऊ का भी महत्व था। कहते हैं औरंगजेब ने लाखों सनातन संस्कृति के अवलंबियों को जनेऊ के कारण मौत के घाट उतारा था। बड़े दु:ख की बात हैं कि, आज सनातनी लोग अपने हाथों से अपनी शिखा काट रहे हैं, और जनेऊ धारण करने को पुरातन पंथी कहते हैं, यह गुलामी की मानसिकता है।
शिखा और जनेऊ हिन्दुत्व की भी पहचान हैं। ये हमारे धर्म और संस्कृति के रक्षक हैं। शिखा और जनेऊ के विशेष महत्व के कारण ही हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा और जनेऊ की रक्षा के लिए सिर कटवा दिए, पर शिखा नहीं कटवाई और न जनेऊ ही उतारा।
वास्तव में मानव-शरीर को प्रकृति ने इतना सबल बनाया है कि वह बड़े से बड़े आघात को भी सहन कर जाता है, परन्तु शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर आघात से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती हैं। इन्हें मर्म-स्थान कहा जाता है।
शिखा के अधोभाग में भी मर्म-स्थान होता है, मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त (भँवर) होता है, वहाँ संपूर्ण नाड़ियों व संधियों का मेल होता ( ‘अधिपतिमर्म’) है। यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो सकती है। शिखा इस स्थान का सुरक्षा कवच है। इसके अलावा यह शारीर का गुरुत्वाकर्षण केंद्र माना जाता है, जहां से हमारे दिल, दिमाग, मन, मस्तिष्क में अच्छे विचार और देवीय अनुदान, वरदान आकर्षित होते रहते हैं।
शिखा रखने व जनेऊ धारण करने से सद्‌बुद्धि, सद्‌विचारादि की प्राप्ति होती है, आत्मशक्ति प्रबल बनती है, मनुष्य धार्मिक , सात्विक व संयमी बना रहता है, लौकिक जीवन में भौतिक सुख तथा परलोक में सदगति प्राप्त होती है और सभी देव शक्तियों से सुरक्षा कवच प्राप्त होता है, जिम्मेवारी, बहादुरी, ईमानदारी और समझदारी बढ़ती है, साथ ही चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सभी दृष्टिकोण से शिखा और जनेऊ की महत्ता स्पष्ट होती है, परंतु आज हिन्दू लोग पाश्चात्य विकृति मानसिकता के चक्कर में पड़कर शिखा और जनेऊ नहीं रखते व अपने ही हाथों अपनी संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं।होना यह चाहिए कि लोग हँसी उड़ाएं, पागल कहें, तो भी बिना परवाह किए अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। मनुष्य मात्र का कल्याण चाहने वाली अपनी संस्कृति नष्ट हो रही है, इसे बचाने का हर सम्भव प्रयास करना चाहिए।

परिचय–प्रख्यात कवि,वक्ता,गायत्री साधक,ज्योतिषी और समाजसेवी `एस्ट्रो अमल` का वास्तविक नाम डॉ. शिव शरण श्रीवास्तव हैL `अमल` इनका उप नाम है,जो साहित्यकार मित्रों ने दिया हैL जन्म म.प्र. के कटनी जिले के ग्राम करेला में हुआ हैL गणित विषय से बी.एस-सी.करने के बाद ३ विषयों (हिंदी,संस्कृत,राजनीति शास्त्र)में एम.ए. किया हैL आपने रामायण विशारद की भी उपाधि गीता प्रेस से प्राप्त की है,तथा दिल्ली से पत्रकारिता एवं आलेख संरचना का प्रशिक्षण भी लिया हैL भारतीय संगीत में भी आपकी रूचि है,तथा प्रयाग संगीत समिति से संगीत में डिप्लोमा प्राप्त किया हैL इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकर्स मुंबई द्वारा आयोजित परीक्षा `सीएआईआईबी` भी उत्तीर्ण की है। ज्योतिष में पी-एच.डी (स्वर्ण पदक)प्राप्त की हैL शतरंज के अच्छे खिलाड़ी `अमल` विभिन्न कवि सम्मलेनों,गोष्ठियों आदि में भाग लेते रहते हैंL मंच संचालन में महारथी अमल की लेखन विधा-गद्य एवं पद्य हैL देश की नामी पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैंL रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी केन्द्रों से भी हो चुका हैL आप विभिन्न धार्मिक,सामाजिक,साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े हैंL आप अखिल विश्व गायत्री परिवार के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। बचपन से प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पुरस्कृत होते रहे हैं,परन्तु महत्वपूर्ण उपलब्धि प्रथम काव्य संकलन ‘अंगारों की चुनौती’ का म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मलेन द्वारा प्रकाशन एवं प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा द्वारा उसका विमोचन एवं छत्तीसगढ़ के प्रथम राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय द्वारा सम्मानित किया जाना है। देश की विभिन्न सामाजिक और साहित्यक संस्थाओं द्वारा प्रदत्त आपको सम्मानों की संख्या शतक से भी ज्यादा है। आप बैंक विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. अमल वर्तमान में बिलासपुर (छग) में रहकर ज्योतिष,साहित्य एवं अन्य माध्यमों से समाजसेवा कर रहे हैं। लेखन आपका शौक है।

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