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समरसता मुस्कान जग

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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आज फँसा मँझधार में,सत्य मीत अरु प्रीत।
लोभ अनल में जल रहा,समरसता संगीत॥

मिशन था अंबेडकर,समरसता संदेश।
समता ही स्वाधीनता,दलित हरित उपवेश॥

तार-तार अनुबन्ध अब,क्षत-विक्षत ईमान।
नश्वर इस संसार में,बिकता है इन्सान॥

मातु पिता भाई समा,शिक्षक मीत जहान।
सदाचार परहित विनत,समरसता वरदान॥

भौतिक सुख चाहत बला,है विनाश तूफान।
नीति प्रीति यश त्याग सब,भूले बन शैतान॥

डूब रही इन्सानियत,नौका प्रीति ज़मीर।
सत्य न्याय पतवार से,बदल राष्ट्र तस्वीर॥

बनें सेतु जग शान्ति का,समरसता बन्धुत्व।
हो शिक्षा सापेक्ष जग,बचे मनुज अस्तित्व॥

हो रचना उन्नति वतन,समरसता मधुशाल।
शान्ति सुखद खुशियाँ मुदित,सेतु बन्ध रसधार॥

समरसता के रंग में,सराबोर परिवेश।
अनेकता में एकता,दे भारत संदेश॥

समरसता के रंग में,सराबोर त्यौहार।
होली मानक एकता,सद्भावन उपहार॥

होली नित सौहार्द्र का,प्रीति मिलन त्यौहार।
मान कीर्ति सुख-सम्पदा,मानवता उपहार॥

दुर्गाराधन पर्व यह,समरसता त्यौहार।
खुशी दीप दीपावली,बनी प्रकृति उपहार॥

दौलत की चाहत बड़ी,लेता मज़हब आड़।
उसूल बिन इन्सानियत,समरसता दो फाड़॥

जीवन हो मधुरिम सुखद,सदा सत्य व्यवहार।
अगर सरल निर्मल हृदय,वसुधा ही परिवार॥

भगवा मानक शौर्य का,चहुँमुख सुखद विकास।
समरसता मुस्कान यश,नीति प्रीति विश्वास॥

कवि ‘निकुंज’ व्यवहार से,बाँटे जग मुस्कान।
परिवारिक जीवन मधुर,गायें समरस गान॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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