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सहज बुनियाद हिलती है

अवधेश कुमार ‘आशुतोष’
खगड़िया (बिहार)
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(रचना शिल्प:१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)
कठिन श्रम से सफलता शीघ्र सबको हाथ लगती है,
लगाओ जोर दम भरके,सहज बुनियाद हिलती है।

कमाओ लाख धन चाहे,महल मोटर बनाओ तुम,
न दे ये काम, जीवन की कभी जब शाम ढलती है।

निकट जब बाल बच्चे हों,मजा तब नौकरी में है,
अगर परदेश में निर्जन,कमी भरपूर खलती है।

जभी घर शाम को आते,थकन काफूर हो जाती,
पिलाती चाय जब बीबी,हिया में प्रीति पलती है।

अगर नेता नहीं कर्मठ,रहे ईमान भी डगमग,
उसे तो वोट देना ही,भयंकर भूल-गलती है।

उजागर घोषणा से है,सरासर चाल वोटों की,
अजूबा देख नेता को,हृदय में आग जलती है॥

परिचय-अवधेश कुमार का साहित्यिक उपनाम-आशुतोष है। जन्म तारीख २० अक्टूबर १९६५ और जन्म स्थान- खगरिया है। आप वर्तमान में खगड़िया (जमशेदपुर) में निवासरत हैं। हिंदी-अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले आशुतोष जी का राज्य-बिहार-झारखंड है। शिक्षा असैनिक अभियंत्रण में बी. टेक. एवं कार्यक्षेत्र-लेखन है। सामाजिक गतिविधि के निमित्त साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेते रहते हैं। लेखन विधा-पद्य(कुंडलिया,दोहा,मुक्त कविता) है। इनकी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें-कस्तूरी कुंडल बसे(कुंडलिया) तथा मन मंदिर कान्हा बसे(दोहा)है। कई रचनाओं का प्रकाशन विविध पत्र- पत्रिकाओं में हुआ है। राजभाषा हिंदी की ओर से ‘कस्तूरी कुंडल बसे’ पुस्तक को अनुदान मिलना सम्मान है तो रेणु पुरस्कार और रजत पुरस्कार से भी सम्मानित हुए हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-हिंदी की साहित्यिक पुस्तकें हैं। विशेषज्ञता-छंद बद्ध रचना (विशेषकर कुंडलिया)में है।