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सावधानी बरतें, मौत और नपुंसकता को न बुलाएँ

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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भारत वर्ष एक स्वछन्द देश है। यहाँ सब प्रकार की छूट है, जैसे-अपराध हो, भ्रष्टाचार में, अनुशासनहीनता, मिलावट आदि जितनी जितना अधिक कर सको वह सब संभव है। दूसरा हमारे देश दूसरे देशों का पिछलग्गू है। जैसे अमेरिका के यहाँ जो सामग्री अनुपयोगी होती है, उसे हम अंधाधुंधकरण के कारण उसे सहर्ष स्वीकारते हैं। जो सामान गुणवत्तायुक्त और उपयोगी हो, उसे जरूर स्वीकार करें, पर आजकल आक्रामक बाजारीकरण के कारण हम भारतीय उन अनुपयोगी और खतरनाक सामग्रियों को स्वीकारते हैं तथा अपने-आपको मौत के मुँह में धकेलते हैं।
देश में पहले बिना रसायन युक्त खाद्य सामग्रियों का उपयोग होने से बहुत अधिक सीमा तक सुरक्षित और निरोग रहते थे। जैसे-घरों में आटे व बेसन से बनी सामग्रियां बहुत अधिक बनती थी। तेल-घी शुद्ध गुणवत्तायुक्त होता था। समय ने करवट बदली और बाज़ारीकरण के कारण नमकीन-मिठाई सरल सुगमता से मिलना शुरू हुए। हमारी निर्भरता बाज़ार पर हो गई और अब पूरे वर्ष जो चाहिए, वह मिलता है।

यहाँ तक तो ठीक था, पर जो खाद्य सामग्री परोसी जा रही है, वह एक प्रकार से जहर है। उनमें ऐसे-ऐसे रसायनों का उपयोग किया जाता है, जिससे वे उनके व्यसन के साथ अपने शरीर में जहर पहुंचा रहे हैं। ये हमें रुग्ण बनाने की योजना है, जिससे देश रोगी रहे और हम दवा और चिकित्सकों के चंगुल में रहें। इससे हमारा धन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में विदेश ही जा रहा है।
अब बात करें ऐसे रसायन की तो ‘रेड डाई ३’ रसायन आइसिंग, न्यूट्रिशनल शेक, कैंडी जैसे ३ हज़ार उत्पादों में उपयोग किया जाता है। इस पर अमेरिका में १९९० से प्रतिबन्ध है। यह बच्चों में अतिप्रतिक्रियावादी व व्यवहार सम्बन्धी समस्याएं बढ़ा देता है तो शीतल पेय में इस्तेमाल होने वाला ब्रोमिनेट वेजिटेबल आयल थाइरॉइड हार्मोन पर असर डालता है।
ऐसे ही टाइटेनियम डाइऑक्साइड प्रतिरोधी तंत्र को कमजोर करता है। यह कैंडी, पनीर-पिज़्ज़ा, आइसक्रीम जैसी जमी सामग्रियों में इस्तेमाल होता है। इसे कई देशों ने प्रतिबंधित कर दिया है, क्योंकि यह डीएनए संरचना और प्रजनन तंत्र को भी प्रभावित करता है। ऐसे ही पोटेशियम ब्रोमेट ब्रेड जैसी बैक चीज़ों में उपयोग होता है, जो कैंसर कारक है। पेस्ट्री और टाट्रीला में उपयोग होने वाला प्रोपाइल पैराबेन एंड्रोक्राइन ग्रंथियों और प्रजनन तंत्र (नपुंसकता) को प्रभावित करता है। इसके अलावा टाइटेनियम डाइऑक्साइड का देश में खाने की चीज़ों में जमकर इस्तेमाल हो रहा है, जबकि प्रतिबंधित है। इसका उपयोग सौंदर्य प्रसाधनों में भी हो रहा है। पहले यह सोचा जाता था कि, मांसाहार ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, पर अब हम चारों तरफ से मौत से घिरे हैं। इससे बचने का एकमात्र उपाय है कि बाजार की इन सामग्री का कम से कम उपयोग करें और घरों में तैयार नमकीन पकवानों को खाएं तो सुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार हमारा स्वास्थ्य धन की बर्बादी से कोई नहीं बचा सकता और किडनी कैंसर जैसे रोग होने से कमाया हुआ धन भी काम नहीं आएगा।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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