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स्वदेशी

सपना सी.पी. साहू ‘स्वप्निल’
इंदौर (मध्यप्रदेश )
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“सुमीत! तुम्हारे साथ खरीदारी पर जाना मुझे बिल्कुल भी नहीं भाता। ये मत लो, वो मत लो! तुम कितनी सुंदर-सुंदर चीजों को छोड़कर, ये हाथ से बनी हुई चीजें ले रहे हो ? ऐसे तो हमारे घर की सजावट अलग हटकर कैसे लगेगी ??? इस तरह झल्लाकर अमिता ने अनवरत सुमीत से कहा।”
“अमिता मेरे लिए आडम्बरी सुंदरता से बड़ा प्यार है।”
“किस प्यार की बात कर रहे हो ? अमिता ने गंभीरता से कहा।”
“अरे बाबा अमिता! तुम भी ना…मैं देश से प्यार की बात कर रहा हूँ और नहीं चाहता कि, अपने नए घर की साज-सज्जा में एक भी सामान विदेशी हो, हम हथकरघा व कुटीर उद्योग को बढ़ावा देंगे तो ही गाँधी जी का स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार होगा। इसलिए कह रहा हूँ, सुंदरता से समझौता कर सकता हूँ, पर अपने प्यार से नहीं।”

ओह सुमीत! अब अमिता के चेहरे पर गर्व मिश्रित मधुरिम मुस्कान के साथ स्वदेशी वस्तुओं में अपनत्व दिखने लगा।