डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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भारतीय वैदिक, पौराणिक एवं आध्यात्मिक परम्परा में ‘स्वर्ग’ केवल एक भौतिक स्थान नहीं, अपितु पुण्य, सदाचार, धर्म, न्याय, प्रेम और दिव्य चेतना का परम प्रतीक माना गया है। यह वह अलौकिक लोक है, जहाँ दुःख, क्लेश, रोग, शोक, भय और अभाव का प्रवेश नहीं होता। स्वर्ग को देवताओं का निवास, पुण्यात्माओं का विश्राम-स्थल तथा शुभ कर्मों का श्रेष्ठ प्रतिफल कहा गया है। मानव की अनादि आकांक्षा रही है, कि वह अपने जीवन को इतना पवित्र बनाए कि उसे दिव्य सुख और परम शान्ति की प्राप्ति हो।
वैदिक साहित्य में स्वर्ग का उल्लेख प्रकाश, आनन्द और अमरत्व के लोक के रूप में मिलता है। ऋषियों ने इसे कर्मफल की श्रेष्ठ अवस्था माना है। पौराणिक ग्रन्थों में स्वर्ग का अधिपति देवराज इन्द्र बताया गया है, जहाँ नन्दनवन, कल्पवृक्ष, कामधेनु, गन्धर्व, अप्सराएँ तथा दिव्य वैभव विद्यमान हैं। यह वर्णन केवल सुख-संपन्नता का चित्रण नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि सत्कर्म मनुष्य को उच्चतर जीवन-मूल्यों तक पहुँचाते हैं।
स्वर्ग की उत्पत्ति का सम्बन्ध सृष्टि-रचना से जोड़ा गया है।
सनातन दर्शन के अनुसार परमब्रह्म की संकल्पशक्ति से सृष्टि का विस्तार हुआ। ब्रह्माण्ड के विविध लोकों में देवलोक अथवा स्वर्गलोक को पुण्य और प्रकाश का केन्द्र माना गया। यह सृष्टि के संरक्षण, संतुलन तथा धर्म की स्थापना में सहायक दिव्य शक्तियों का कार्यक्षेत्र है। यद्यपि, इसका स्वरूप रहस्यपूर्ण और अलौकिक माना गया है, तथापि इसका आध्यात्मिक अर्थ मानव के अंतःकरण में स्थित सद्गुणों का उत्कर्ष भी है।
स्वर्ग की सबसे बड़ी उपलब्धि मानव को सत्पथ की प्रेरणा देना है। यदि स्वर्ग की अवधारणा न होती तो पुण्य, त्याग, सेवा, करुणा, न्याय और लोकमंगल की भावना उतनी प्रभावी न बन पाती। यह मनुष्य को स्मरण कराती है कि प्रत्येक कर्म का परिणाम है और धर्मयुक्त जीवन ही वास्तविक समृद्धि का आधार है। स्वर्ग का विचार व्यक्ति को मर्यादा, पुरुषार्थ, कर्तव्यपरायणता और आत्मसंयम की ओर अग्रसर करता है।
वास्तव में स्वर्ग केवल मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाला कोई लोक ही नहीं, बल्कि वह स्थिति भी है जहाँ प्रेम हो, विश्वास हो, न्याय हो, प्रकृति का संरक्षण हो, मानवता का सम्मान हो तथा जीवन में सत्य और सदाचार का शासन हो। जिस परिवार में स्नेह है, जिस समाज में समरसता है, जिस राष्ट्र में न्याय है और जिस हृदय में ईश्वर का प्रकाश है, वहाँ स्वर्गीय अनुभूति स्वतः प्रकट हो जाती है।
अतः, स्वर्ग को केवल सुखद कल्पना मानकर छोड़ देना उचित नहीं। यह मानव सभ्यता के उच्चतम आदर्शों, आध्यात्मिक उत्कर्ष, नैतिक जीवन व लोककल्याणकारी दृष्टि का दिव्य प्रतीक है। स्वर्ग हमें यह संदेश देता है कि धर्म, प्रेम, सत्य और करुणा से युक्त जीवन ही वास्तविक परमधाम की ओर ले जाने वाला मार्ग है।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥