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हम उन्हीं से पूछ आते हैं

 डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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क्यों उलझ गई है ये जिन्दगी,
कि चलो अब इसे सुलझाते हैं।
आखिर हुई ऐसी बात क्या,
हम उन्हीं से पूछ आते हैं॥

दिन-रात खयालों में क्यों,
उनका आना-जाना है।
होंठों पर भी क्यों हरदम,
उनका ही तराना है।
ख्वाबों में भी क्यों आते-जाते हैं,
आखिर हुई ऐसी बात क्या-
हम उन्हीं से पूछ आते हैं…॥

ये कैसी उदासी-सी,
चहुंओर छायी है।
चुपचाप है खामोशी,
और तन्हाई ही तन्हाई है।
क्यों यादों की बारात लेकर आते हैं,
आखिर हुई ऐसी बात क्या-
हम उन्हीं से पूछ आते हैं…॥

भटक रही है रूह,
अनजानी-सी दिशाओं में।
चैन भी आता नहीं इन,
महकी फिजाओं में।
शबनमी रुत में भी आग लगा जाते हैं,
आखिर हुई ऐसी बात क्या-
हम उन्हीं से पूछ आते हैं…॥
क्यों उलझ गई है जिन्दगी,
कि चलो अब इसे सुलझाते हैं॥

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