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हम बचाएंगे बेटों को…

दीपेश पालीवाल ‘गूगल’ 
उदयपुर (राजस्थान)
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हम उस देश के निवासी है जहां बेटी को लक्ष्मी कहाँ जाता है,घर-घर बेटी को पूजा जाता है,बेटी को दुर्गा काली का अवतार माना जाता है,जहाँ के वेदों में लिखा है-
“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते,
रमयन्ते तत्र देवता।”
क्या ऐसे देश में बेटी को बचाने की आवश्यकता है,तो मैं कहूँगा नहीं। तो फिर देश में आज बेटियों की दुर्दशा क्यों है ?
क्यों आज बेटियाँ घर से निकलने को हिचकिचाती है?
क्यों आज देश में अगल-अलग जगह बलात्कार होते है ?
क्यों आज बेटियों को उचित सम्मान नहीं मिल पाता ? क्यों ? कौन जिम्मेदार है ?
हमारे बेटे क्योंकि,हम बेटियों को पढ़ाने में लगे हुए हैं,हम सदैव बेटियों को पढाते है संस्कार सिखाते है यह मत करो,वो मत करो,ऐसे कपड़े मत पहनो,रात को घर से बाहर नही निकलना।
यह सारी चीजें हम बेटियों को सिखाते हैं।
हम कभी बेटे को नहीं सिखाते कि वो बेटी का सम्मान करें। हम बेटे को शर्म नहीं सिखाते,हम बेटे को अनुशासन नहीं सिखाते,हम बेटे को संस्कार नहीं सिखाते, हम बेटे को नही सिखाते कि,नारी का सम्मान कैसे किया जाए। हम बेटे को नहीं सिखाते कि कभी किसी की बहन पर वह टिप्पणी न करे जो वो स्वयं की बहन के लिए नहीं सुनना चाहते। हम नहीं सिखाते कि,अकेली लड़की मौका ही जिम्मेदारी होती है। हम बेटों को बताते हैं तुम शेर पर यह बताना भूल जाते है कि,शेर की सवारी सदैव दुर्गा करती है। इसलिए आज से हम बेटी को नही पढ़ाएंगे,नहीं सिखाएंगे। अब हम बेटों को को पढ़ाएंगे बेटों को सिखाएंगे।
और,हाँ क्यों बचाए हम बेटी को ? हम बचाएंगे बेटों को। हम कुसंस्कारों, कुसंगति से,दुर्व्यवहार से,नशे से बचाएंगे।
हम क्यों सिखाए बेटी को ? हम सिखाएंगे बेटों को,सुसंस्कार,सम्मान,जिम्मेदारी हम सिखाएंगे। देशभक्ति,बुजुर्गों का सम्मान, शर्म और अनुशासन हम सिखाएँगे।
आज देश को आवश्यकता बेटी पढ़ाने की या बेटी बचाने की नहीं है। अगर आवश्यकता है तो बेटों को पढ़ाने की,बेटों को बचाने की।
यकीं मानिए कि यदि हम देश के बेटों को संस्कार सिखाएँगे तो देश की बेटी स्वतः ही सुरक्षित हो जाएगी,इसलिए बेटी नहीं बेटा पढ़ाए।