कुल पृष्ठ दर्शन : 327

You are currently viewing हर शाम आजकल…

हर शाम आजकल…

कमलेश वर्मा ‘कोमल’
अलवर (राजस्थान)
*************************************

बड़ी उदासी-सी नजर आती है हर शाम आजकल,
तुम बिन खामोशी-सी छा जाती है हर शाम आजकल।

तेरे बग़ैर यूँ ही गुजर जाती है हर शाम आजकल,
हर मुस्कुराहट नाकाम हो जाती है हर शाम आजकल।

न जाने क्या-क्या कर जाती है हर शाम आजकल,
तुम बिन मुस्कुराहट भी थम जाती है हर शाम आजकल।

तन्हाइयों में सिमट कर रह जाती है हर शाम आजकल,
नाकाम हो कर रह जाती है हर शाम आजकल।

हर ख्वाब में दुल्हन बन कर रह जाती है,
तन्हाई में बेकरार हो जाती है हर शाम आजकल।

मुस्कुराने की हर कोशिश भी नाकाम हो जाती है,
न जाने क्यों कहर-सा ढाती है हर शाम आजकल।

हर वक्त उदासी-सी नजर आती है हर शाम आजकल,
तुम बिन गुमसुम-सी नजर आती है हर शाम आजकल।

तन्हाई में तड़प कर रह जाती है हर शाम आजकल,
हर तरफ खामोशी-सी नजर आती है हर शाम आजकल॥

परिचय –कमलेश वर्मा लेखन जगत में उपनाम ‘कोमल’ से पहचान रखती हैं। ७ जुलाई १९८१ को दुनिया में आई रामगढ़ (अलवर) वासी कोमल का वर्तमान और स्थाई बसेरा जिला अलवर (राजस्थान) में ही है। आपको हिन्दी, संस्कृत व अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है। एम.ए. व बी.एड. तक शिक्षित कमलेश वर्मा ‘कोमल’ का कार्यक्षेत्र व्याख्याता (निजी संस्था) का है। इनकी लेखन विधा-गीत व कविता है। इनकी रचनाएं पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं तो ब्लॉग पर भी लेखन जारी है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-“कविता के माध्यम से विचार प्रकट करना एवं लोगों को जागरूक करना है।” पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, एवं जय शंकर प्रसाद हैं तो विशेषज्ञता- पद्य में है। बात की जाए जीवन लक्ष्य की तो भारतीय समाज में सम्मान प्राप्त करना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार -“राष्ट्र एक व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास राष्ट्र पर निर्भर करता है। हिंदी हमारी राष्ट्र और मातृत्व भाषा है, जो सरल तरीके से समझी और बोली भी जा सकती है। इसलिए इसे बढ़ाया ही जाना चाहिए।”