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हिमालय उत्तंग शीश हिंदी

सच्चिदानंद किरण
भागलपुर (बिहार)
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हिंदी की बिंदी…


हिंदी की बिंदी है हमारी,
भारत माँ की ललाट बिंदी।

शोभित हो रही हर किसी,
के जहन में हिंदी की बिंदी।

शब्द-बोल हो हिंदी हमारी,
राष्ट्र की भाषा बने यूँ हिंदी।

हिंदी की बिंदी चम-चमके,
हिमालय उत्तंग शीश हिंदी।

हर भाषा से आगे रहे हिंद,
की हिंदी हमारी लाल बिंदी।

माँ शारदे तुझे वंदन करे यूँ,
हिंदी की लाली चमके बिंदी।

साहित्यांगन की विद्वतेय में,
रंग-रंगे शब्दें हिंदी की बिंदी।

अवनी-अंबर में जा गूँजे मधु,
स्वरता‌ में गाते हिंद की हिंदी।

धन्य-धन्य हे‌ भारत माता तेरी,
चाहें हम विस्तारित हो हिंदी।

चरणों शीश नवाता ‘किरण’ यूँ,
शोभे‌ ललाट ‘हिंदी की बिंदी’॥

परिचय- सच्चिदानंद साह का साहित्यिक नाम ‘सच्चिदानंद किरण’ है। जन्म ६ फरवरी १९५९ को ग्राम-पैन (भागलपुर) में हुआ है। बिहार वासी श्री साह ने इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की है। आपके साहित्यिक खाते में प्रकाशित पुस्तकों में ‘पंछी आकाश के’, ‘रवि की छवि’ व ‘चंद्रमुखी’ (कविता संग्रह) है। सम्मान में रेलवे मालदा मंडल से राजभाषा से २ सम्मान, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ (२०१८) से ‘कवि शिरोमणि’, २०१९ में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ प्रादेशिक शाखा मुंबई से ‘साहित्य रत्न’, २०२० में अंतर्राष्ट्रीय तथागत सृजन सम्मान सहित हिंदी भाषा साहित्य परिषद खगड़िया कैलाश झा किंकर स्मृति सम्मान, तुलसी साहित्य अकादमी (भोपाल) से तुलसी सम्मान, २०२१ में गोरक्ष शक्तिधाम सेवार्थ फाउंडेशन (उज्जैन) से ‘काव्य भूषण’ आदि सम्मान मिले हैं। उपलब्धि देखें तो चित्रकारी करते हैं। आप विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ केंद्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य होने के साथ ही तुलसी साहित्य अकादमी के जिलाध्यक्ष एवं कई साहित्यिक मंच से सक्रियता से जुड़े हुए हैं।

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